Thursday, May 19th, 2022

Artical : पीएम जी की सुनो…
(व्यंग्य : राजेन्द्र शर्मा)

भाई, विपक्षी सरकारों की ये बात बिल्कुल ठीक नहीं है। बताइए, 130 करोड़ भारतवासियों के पीएम को उनसे प्रार्थना करनी पड़ रही है। न निर्देश, न आदेश, प्रार्थना और वह भी तेल पर वैट घटाने की।

और प्रार्थना भी कोई अपने लिए नहीं, बल्कि खुद उनकी पब्लिक के भले के लिए। और ये हैं कि पहले आप, पहले आप की लखनवी नफासत छांट रहे हैं — पहले केंद्र सरकार तेल पर अपना टैक्स घटाए, फिर देखेंगे! पहली बात तो यह हैकि विपक्षी सरकारें ये जो कर रही हैं, इसका लखनवी नफासत से दूर तक कोई रिश्ता नहीं है।

यह पहले आप का नहीं, फिल्म दीवार वाला मामला है — पहले फलां का दस्तखत लेकर आओ, पहले ढिमकां का दस्तखत लेकर आओ। खैर! मोदी जी तो इस झांसे में आने वाले ही नहीं हैं कि राज्यों से तेल पर टैक्स कम करने के लिए कहने से पहले, वह खुद तेल पर टैक्स कम क्यों नहीं करते।

उनके टैक्स कम करने से राज्यों का टैक्स तो अपने आप ही कम हो जाएगा। जी ऐसी होड़ में विश्वास ही नहीं करते हैं कि पहले वह तेल पर टैक्स कम करें, तब राज्य कम करेंगे? विपक्षी सरकारें तक इस तरह नकलची बनें, यह उन्हें पसंद नहीं है, भले ही वे उनकी सरकार की ही नकल क्यों नहीं कर रही हों।

वह तो सहकारी संघवाद यानी मिल-जुलकर प्रयास करने में विश्वास करते हैं। सिंपल है, केंद्र ने ज्यादा कर वसूल कर लिया है, तो राज्य अपनी कर वसूली कम कर दें। कम से कम पब्लिक पर ज्यादा बोझ नहीं पड़ेगा। एक पीएम का पब्लिक के भले के लिए तेल पर टैक्स जरा सा कम कराने की मांग करना भी गुनाह है क्या?

रही बात देश के मुख्यमंत्रियों से ही कर घटाने की मांग करने की, तो मोदी जी अगर अपने भारत के राज्यों की सरकारों से कर घटाने की प्रार्थना नहीं करेंगे, तो क्या पाकिस्तान या अफगानिस्तान की सरकारों से तेल पर टैक्स कम करने की मांग करने जाएंगे!

फिर विपक्षी सरकारों को कम से कम यह तो देखना चाहिए कि प्रार्थना करने वाला कौन है? और कुछ नहीं तो 130 करोड़ के पीएम की प्रार्थना की तो लाज रख लेते। पीएम जी को यूं खाली हाथ लौटाना तो सही नहीं है।

(व्यंग्यकार वरिष्ठ पत्रकार और ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)

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