Friday, July 23rd, 2021

BAKREED 2021 :- मोहब्बत और फर्ज को दिल से निभाने ,जरूरतमंदों की दुआओं को लेने का पवित्र सन्देश देता है – बकरीद

रायपुर,(न्यूज़ हसल इंडिया)

भारत में अनेक धर्म और संस्कृति का समागम माना जाता है। हर धर्म की अपनी अलग अलग आस्था और मनाने के अलग अलग तरीके होते हैं। इन्ही में से एक होता है। इस्लाम धर्म में मनाया जाने वाला त्यौहार बकरीद। सभी धर्म के लोग अपने अपने त्याहौरों और धर्म में आस्था को लेकर काफी उत्सुक रहते हैं। धर्म की रक्षा करेंगे तभी धर्म भी हमारी रक्षा करेगा। इस्लाम धर्म का पवित्र पर्व बकरीद आज है। वैसे तो इस्लाम में दो खास त्यौहार होते है एक तो ईद-उल-जुहा और दूसरा ईद  -उल-फितर। ईद -उल-फितर के दिन लोग मीठी सेवई से मुहं मीठा करके ईद मनाते हैं। यह त्यौहार उनके लिए बिलकुल हिन्दुओं में मनाए जाने वाले दीवाली की तरह होता है। इसमें  लोग रोजा करके बहुत ही कठिन उपवास करके इस त्यौहार को मानते हैं। इस दिन मुसलमान लोग बहुत से नेकी के काम भी करते है जैसे जरूरतमंदों की सेवा करना और भूखों को भोजन देना आदि।  ठीक इसी प्रकार बकरीद भी मनाया जाता है। यह हज खत्म होने पर मनाया जाता है।  जैसे हिन्दुओं में धर्म , ैरठ और काम, मोक्ष को जीवन का मुख्य सिद्धांत माना जाता है। ठीक उसी प्रकार इस्लाम धर्म में पांच फर्ज माने गए हैं। इसमें मुसलमानों को अपने जीवनकाल में एक बार हज जाने के खास महत्व होता है। लेकिन हज जाने से पहले लोगों को अपने परिवार के प्रति सारे जिम्मेदारियों को पूरा करने को प्राथमिकता  दिया गया है। इसका मतलब साफ है पहले आप अपने कर्तव्यों को ईमानदारी के साथ पूरा करो फिर हज यात्रा पर जाओ। खुदा भी यही चाहता है कि उनके पास जो भी आए वो सिर्फ तब आए जब वो पूरी तरह से खुद को परिवार के जिम्मेदारियों से मुक्त समझे और खुश रहे। जब आए उसके पास तो बस उसका ही होकर आए और अपने खुदा का दीदार बड़े ही शिद्दत से करे और अपने और अपने परिवार और दोस्तों के लिए दुआओं और खुशियों का ख़जाना साथ लेकर जाए। हज की यात्रा भी बहुत ही कठिन होती है। इसमें जाना भी किसी खुशकिस्मती से कम नहीं होता है। इसलिए जब हज यात्री अपने अपने स्टेशनों और शहरों में वापस आते हैं तो उनका दिल खोलकर स्वागत फूल माला पहनाकर भी किया जाता है। इस्लाम में बलिदान का बहुत ही अधिक महत्व है ऐसी मान्यता है कि अपनी सबसे प्यारी चीज को खुदा के रास्ते में कुर्बान कर दो। इसका मतलब साफ है दुनिया में आए हो तो अपना हर पल नेकी के काम में खर्च करो।  सोशल मीडिया से मिली जानकारी के अनुसार,  यहूदी, ईसाई और इस्लाम तीनों ही धर्म के पैगंबर हजरत इब्राहीम ने कुर्बानी  की  जो मिसाल  दुनिया के सामने रखी थी , उसे आज भी बड़े ही आस्था के साथ  याद किया जाता है। एक बार आकाशवाणी के चलते कि अल्लाह की रजा के लिए अपनी सबसे प्यारी चीज का बलिदान दे दो , तो हजरत इब्राहीम बड़े ही गंभीर सोच में पड़ गए और उन्हें उस समय यह खयाल आया कि मुझे तो अपनी औलाद से ही सबसे अधिक मोहब्बत है। उन्होंने अपने बेटे का ही बलिदान कर दिया। उनके इस जज्बे को सलाम करने की ख़ुशी में मनाया जाता है  त्योहार  ईद-उल-जुहा। कुर्बानी का खास मकसद है हमेशा अपने परिवार, समाज और मुल्क में रहने वाला व्यक्ति अच्छे कामों को करते हुए अपने फर्ज से कभी भी मुहं नहीं मोड़ना चाहिए। उसे अपने और जरूरतमंद लोगों की सेवा में हमेशा आगे रहना चाहिए। 

इस बार बकरीद पर कोरोना के चलते काफी महँगाईयों का सामना करना पड़ रहा है। इस बार बकरों के दाम को आम आदमी की जेब पर महंगाई की मार का सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा जिन बकरा व्यापारियों ने बकरों को पालने के लिए अपनी जो धनराशी उन पर खर्च की है। वह भी वसूल हो पाना काफी मुश्किल दिख रहा है। कपडा व्यापारियों के  हालात भी कुछ इसी तरह नज़र आ रहे हैं। अल्लाह हमेशा ही अपने चाहने वालों  को दिल से याद करने पर ही उनके सलाम को कुबूल कर लेते हैं। इंसान का दिल साफ हो और मुश्किल हालातों में भी हिम्मत से यदि कोई इंसान त्यौहरों को ख़ुशी से मानाने की ठान ले तो बकरीद ही नहीं दुनिया का हर दिन हमेशा ही खुशियों से सराबोर रहेगा।  

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