Tuesday, June 22nd, 2021

Buddha Purnima 2021 : बुद्धम् सरणम् गच्छामि, धम्मम् सरणम् गच्छामि, संघम् सरणम् गच्छामि -लक्ष्मीकांत कोलते

buddha purnima 2021 : बुद्धम् सरणम् गच्छामि, धम्मम् सरणम् गच्छामि, संघम् सरणम् गच्छामि

buddha purnima 2021

तथागत

बुद्धम् सरणम् गच्छामि
धम्मम् सरणम् गच्छामि
संघम् सरणम् गच्छामि

तथागत गौतम बुद्ध के विचारोंकी तरफ जाना याने ज्ञान में जाना, विज्ञान में जाना, विवेक में जाना है। बौद्ध धर्म तथागत भगवान गौतम बुद्ध के विचारों पर आधारित धर्म है। वही बौद्ध धर्म भारत के बाहर सम्राट अशोक के मार्गदर्शन में चीन, जापान, श्रीलंका जैसे देशों में फैल गया। इस धर्म में किसी भी शास्त्र को बुद्धि से श्रेष्ठ नहीं माना जाता है। इसके विपरीत, यह धर्म कहता है कि,

Buddha Purnima 2021


वेदप्रामाण्यं कस्यचित् कर्तृवादः
स्नाने धर्मेच्छा जातिवादवलेपः।
संतापारंभ: पापहानाय चेति
ध्वस्त प्रज्ञानां पंतलिंगानि जाडये।


यह मानना ​​कि शास्त्र मानक हैं, यह मानना ​​कि ईश्वर सभी सृष्टि के निर्माता हैं, यह मानना ​​कि स्नान ही धर्म का पालन है। जाति श्रेष्ठता का अभिमान और यह विश्वास कि शरीर पर अत्याचार करने से पाप धुल जाता है, तर्कहीन इन्सान की मूर्खता के पाँच लक्षण हैं। तथागत गौतम बुद्ध की शिक्षाओं का उद्देश्य चार भागों में आता है।
१) अत्थज्झासय – इसका अर्थ है उपदेश देना जैसा कोई महसूस करता है।

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२) परज्झासय – दूसरों की प्रवृत्ति को पहचानकर किया गया उपदेश।
३) प्रश्नकर्ता – प्रश्नकर्ता द्वारा पूछे गए प्रश्नों का उत्तर देते समय दी गई सलाह या उपदेश।
४) तथाथुपारिक – एक विशिष्ट घटना या कारण के रूप में दिया गया उपदेश।
त्रिपिटक के तीन मूल ग्रंथों में निम्नलिखित ग्रंथ शामिल हैं: ए) सुत्तपिटक (सूत्र पिटक) बी) विनयपिटक सी) अभिधम्मपिटक


ए) सुत्तपिटक (सूत्र पिटक) – इसमें अलग-अलग समय पर तथागत गौतम बुद्ध की शिक्षाएं शामिल हैं। यह पांच खंडों में आता है।
१) दिघणिकाय- बड़े सूत्रों का संग्रह। इसमें ऐसे 34 सूत्र हैं।
२) मज्झिमनिकाय – मध्यम आकार के सूत्रों का संग्रह। इसमें 152 सूत्र हैं।
३) संयुक्त निकाय – छोटे सूत्रों के एक सेट द्वारा उनका संग्रह। इसमें 7762 सूत्र हैं।


४) अंगुत्तर निकाय – संरचना द्वारा व्यवस्थित सूत्रों का संग्रह। इसमें 9557 सूत्र हैं।
५) सुद्दकनिकाय – छोटे मामलों का संग्रह। यह सुद्दाकनिकाय का अगला उपखंड है
सद्दकापाठ, धम्मपद, उदान, इतिवुत्तक, सूत्रनिपात, विमानवत्थु, घेतवत्थु, थेरगाथा, जातक, निदेस, पतिसम्भिदामग्ग, अपदान, बुद्धवंत,चरियापिटक
बी) विनयपिटक – भिक्षुओं और भिक्खूणी योंके संघ के आचरण के नियम दिए गए हैं। इसके पांच भाग

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१) पराजिक – सुत्तविभा – भिक्षुओं और भिक्खुनियों के संघो द्वारा पालन किए जाने वाले नियम
२) पचित्रिय – भिक्खुओं और भिक्खुनियों के सभी समूहों द्वारा पालन किए जाने वाले नियम
३) महावग्ग – भिक्खु संघ कैसे अस्तित्व में आया, चिवर के बारे में जानकारी
४) चुड्डावग – पीने, सोने, दवा की जानकारी

५) परिपार – सिंहल के एक साधु द्वारा रचित परिशिष्ट।
सी ) अभिधम्मपिटक – सात अध्याय हैं जिनमें गहन दार्शनिक प्रश्नों पर चर्चा की गई है।
ये ग्रंथ पाली में हैं। इस भाषा का मूल नाम मगधी है। मगध के लोगों की बोली के रूप में इसका नाम मगधी है।
आर्य सत्ये
१) संसार में दुख है
२) उस दुख का कारण है


३) उसीका कारण है वासना
४) वासना को नियंत्रित करना दुखों को समाप्त करने का उपाय है।
इन चारों आर्यसत्यों को तथागत भगवान गौतम बुद्ध ने बताया है।
पंचशील
१) किसी भी जानवर की कोई हिंसा ना करना या चोट नहीं पहुँचाना। (पानतिपाता वेरमणी सिक्खापदम समादियामी)


२) चोरी न करना और दूसरे की संपत्ति को जबरण न छिनना (अदीन्नादाना वेरमणी सिक्खापदम समादियामी)
३) व्यभिचार नहीं करना (कामेसुमिच्छाचारा वेरमणी सिक्खापदम समदियामी)
४) झूठ नहीं बोलना है (मुसावादा वेरमणी सिक्खापदम समादियामी)
५) शराब नहीं पीना (सुरा मेरय मज्जपमादत्तना वेरमणि सिक्खापदम समादियामी)
यह पंचशील है।


अष्टकोणीय पथ
१) सम्यक दृष्टि-अज्ञान का नाश सम्यक दृष्टि का उद्देश्य है। संतुलित दृष्टि के लिए स्वतंत्र मन और स्वतंत्र चिंतन आवश्यक है।
२) सम्यक संकल्प – आकांक्षा और महत्वाकांक्षा नेक और प्रशंसनीय होनी चाहिए।
३) सम्यक जुबाँ – मनुष्य को सच बोलना चाहिए। उसे सभी से स्नेह और शिष्टता से बात करनी चाहिए। निंदा नहीं करनी चाहिए, क्रोध की भाषा का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
४) सम्यक कर्मंत – जीवन के मूल नियमों के अनुरूप सही व्यवहार की शिक्षा इसका मानक है।
५) (उचित) सम्यक आजीविका – दूसरों को नुकसान पहुँचाए बिना, जीविकोपार्जन का सबसे अच्छा तरीका।


६) (उचित) सम्यक व्यायाम – अज्ञान को मिटाने का यह प्राथमिक प्रयास है। यह एक दुखद स्थिति से बाहर निकलने का रास्ता खोजने के बारे में है।
७) सम्यक स्मृति – मन का निरंतर जागरण, मन को बुरी कामों से बचाना
८) सम्यक समाधि – मन की एकाग्रता, लोभ, घृणा, आलस्य, संदेह इन पांच बाधाओं को रोकना है।
पारमीता (पूर्ण होने के चरण)


१) दान – दूसरे के मूल्य के लिए अपने धन, रक्त, शरीर को अर्पण कर देना याने दान होता है।
२) शुद्धता – पाप का भय, धार्मिकता, बुरे काम न करने और अच्छे काम करने की प्रवृत्ति
३) आलस्य – सांसारिक सुखों का त्याग
४) बुद्धि ( प्रज्ञा ) – ज्ञान, विषय का पूरा ज्ञान होना या फिर पूरे विषय का ज्ञान होना।


५) वीर्य- उचित प्रयास, किए गए कार्य को पूरी ताकत से पूरा करना।
६) शांति – क्षमा। क्षमा से द्वेष को शांत करने के लिए।
७) सत्य – सत्य। सच्चाई के अलावा कुछ नहीं होना चाहिए। सत्य परेशान हो सकता है है किन्तु पराजित कभी भी नही होता।
८) अधिष्ठान – लक्ष्य को प्राप्त करने का संकल्प


९) मित्रता – न केवल मनुष्य के बारे में बल्कि सभी जीवित प्राणियों के बारे में भी भाईचारा रखना।
१०) उपेक्षा करना – तटस्थ रहने की लगातार कोशिश करना। निष्काम भाव से हमेशा प्रयत्न करते जाना।
तथागत भगवान गौतम बुद्ध कहते हैं, “ज्ञान की चमक अग्नि, चंद्रमा और सूर्य की चमक से अधिक है।”

जय जिजाऊ, जय शिवराय

लक्ष्मीकांत कोलते
प्रसिद्ध व्याख्याता एवं लेखक
मध्य प्रदेश राज्यप्रभारी, मराठा सेवा संघ
7031191919

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