Sunday, May 22nd, 2022

Chhttisgarh का बासी

छत्तीसगढ़ धान का कटोरा है, धान इसके गीतों में भी रचा बसा है, क्योंकि धान से ही छत्तीसगढ़ का जीवन है। छत्तीसगढ़ में पके चांवल को मिट्टी या अन्य पात्र मेें पानी में डुबो कर बासी बनाते हैं और नमक डाल कर खाते हैं। यही छत्तीसगढ़ के निवासियों का प्रिय भोजन है। इस बासी के साथ चटनी या छत्तीसगढ़ में बहुतायत में पैदा होने वाले भाजी भी खायी जाती है। काम पर जाते मेहनतकश के साइकिल के हैंडिल पर टंगा बासी का डिब्बा, खेत की मेड़ पर रखा बासी, यही तो है छत्तीसगढ़ की पहचान। बासी खाने के बाद आराम के क्षणों में छत्तीसगढिय़ों के मुंह से कई लोकगीत भी निकले हैं, मेहनती हाथों से साजों के सुर के साथ, पांव भी गम्मत पर थिरकने लगते हैं। इसी बासी को खाकर देश की आजादी में छत्तीसगढ़वासियों ने अंग्रेजों के खिलाफ आवाज बुलंद किया था। छत्तीसगढ़ में 1828 से 1908 तक पड़े कई भीषण अकालों में यहां के लोगों ने बासी और नून अर्थात् नमक खाकर खुद को जिंदा रखा, वहीं अपने संतानों को वास्तविक छत्तीसगढिय़ा बनाया। बासी में जीवन का राग है, मन का संगीत है, आत्मा की शांति है, हमारी सादगी को प्रदर्शित करने की सहज प्रस्तुति है, लेकिन अत्याचार और शोषण के विरूद्ध आग उगलने की ताकत भी यही बासी देती है। छत्तीसगढ़ियों के डी.एन.ए. का विस्तृत विश्लेषण किया जाए तो बासी-पसिया की बहुतायत ही मिलेगी। शरीर को स्वस्थ रखने में भी बासी का विशेष योगदान है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और अनके शोधकर्ताओं का भी मानना है कि बासी में वे सारे गुण और पोषक पदार्थ मौजूद हैं, जोकि एक आदर्श भोजन में होना चाहिए। छत्तीसगढिय़ों के लिए बासी ब्रेक फास्ट भी है, लंच भी है, हैवी टी भी है तो कभी-कभी डिनर भी। छत्तीसगढ़ में क्या ऐसा कोई डिश है जो इतने रूपों में उपयोग की जाती हो, सर्वथा नहीं।
भाषा और शब्दकोश के दृष्टिकोण से देखें तो बासी का मतलब पुराना या सड़ा हुआ से है। इसलिए बासी शब्द आते ही कई लोगों के जेहन में इस व्यंजन के प्रति गलत छवि बन जाती है।
आहार जीवन की प्राथमिक आवश्यकता है। हम जो आहार लेते हैं उसका शरीर में पाचन किया जाता है। पाचन के परिणामस्वरूप प्राप्त होने वाले तत्व शरीर की वृद्धि और सुरक्षा के काम आते हैं। भोजन से कार्य करने के लिये शक्ति भी प्राप्त होती है। मनुष्य ने आहार में काम आने वाले अनेक प्रकार के अनाज, फल, सब्जियां, तिलहन, गिरीदार फ ल आदि की खेती करके और इसी उपयोग में आने वाले पशु-पक्षियों का पालन कर बहुत ही दूरदर्शिता का परियच दिया है। अच्छे स्वास्थ्य के लिए आवश्यक उपयुक्त आहार का चुनाव अनेकानेक लगातार परीक्षणों के बाद ही हुआ है।
किसी क्षेत्र विशेष के उपयुक्त आहार में उस क्षेत्र की जलवायु और मनुष्यों की कार्य प्रकृति का भी ध्यान रखा जाता है। इसके अलावा आहार में मुख्य बात यह है कि वह सस्ता हो, सुलभ हो, बनने में आसान हो और संबंधित सामाग्री उस क्षेत्र में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हो। बासी में यह सारे गुण मौजूद हैं। इन सब बातों को देखते हुए छत्तीसगढ़ में बासी को मुख्य आहार माना गया है और वर्षों से बच्चे, बूढ़े और जवान इसका सेवन करते आ रहे हैं। बासी का सेवन समाज के हर तबके के लोग करते हैं। आसानी से बन जाने वाले सर्वसुलभता के कारण बासी हर घर का नाश्ता और मुख्य आहार है। सामान्यत: छत्तीसगढ़ वासी सुबह के नाश्ते में भी बासी खाते हैं, दोपहर के भोजन में बासी ले लेते हैं। रात में दोपहर के पके चांवल को भी बासी बना दिया जाता है। कई बार गर्मी के दिनों में तो लोग दिन भर बासी ही खाते रहते हैं। इस तरह से हम देखते हैं कि बासी ही छत्तीसगढ़ में प्रमुख आहार के रूप में मान्य है। बासी बनाने की विधि

सामाग्री
पका हुआ चांवल, पसिया, पानी

विधि
चांवल को सामान्य विधि से पका लें, पर ध्यान रहे कि इसे हल्का कड़ा पसायें। जब चांवल को पसा रहें हों तो पसिया का फें के नहीं, बल्कि किसी पात्र में इसे संग्रहित कर लें। पके हुए चांवल को ठंडा होने के लिए छोड़ दें। जब यह ठंडा हो जाए तो किसी चौड़े मुंह के पात्र में इसे रखें और उसमें इतना पानी डाल दें कि चांवल पूरी तरह से डूब जाए। यह ध्यान रहे कि चांवल एक दूसरे में चिपका हुआ न रहने पाए। अगर ऐसा है तो मसल कर चांवल को अलग-अलग कर लें। अब इसमें थोड़ा सा गाढ़ा पसिया डाल दें। इसे किसी सुरक्षित जगह पर रख दें। सुबह तक यह बासी बनकर तैयार हो जायेगा। इसे भाजी, अचार और प्याज के साथ परोस सकते हैं।

बासी के संग खायी जाने वाली चीजें
साबुत आम का हल्का फांक किया हुआ अचार
नींबू का अचार
कटा हुआ प्याज और हरी मिर्च
दही या मही डाल कर
खट्टा भाजी
कांदा भाजी
चेंच भाजी
बोहार भाजी
रखिया बड़ी
मसूर दाल की सब्जी या मसूर बड़ी
रात के बचे हुए पके अरहर दाल के संग
कढ़ी
आम की चटनी
इमली की चटनी
लाखड़ी भाजी
सलगा बरा की कढ़ी
जिर्रा फू ल चटनी
बिजोरी

बासी खाने से लाभ
बासी खाने से होठ नहीं फटते हैं। मुंह में छाले की समस्या नहीं होती है।
इसमें पानी की भरपूर मात्रा होती है, जिसके कारण गर्मी के दिनों में शरीर को ठंडक मिलती है।
पानी की ज्यादा मात्रा होने के कारण मूत्र विसर्जन क्रिया को बढ़ाता है, जिससे उच्च रक्तचाप नियंत्रण करने में मदद मिलती है।
पाचन क्रिया को सुधारने के साथ-साथ नियंत्रण में भी रखता है।
बासी एक प्रकार से डाइयूरेटिक का काम करता है, अर्थ यह है कि बासी में पानी की भरपूर मात्रा होने के कारण पेशाब ज्यादा लगता है, यही कारण है कि नियमित रूप से बासी का सेवन किया जाए तो मूत्र संस्थान में होने वाली बीमारियों से बचा जा सकता है। पथरी की समस्या होने से भी बचा जा सकता है।
चेहरे के साथ-साथ संपूर्ण त्वचा में चमक पैदा करने का काम भी करता है। बासी में पानी और मांड़ की मात्रा होने से ऐसा संभव हो पाता है।
मांसपेशियों को भरपूर ताकत देने की क्षमता बासी में मौजूद है।
कब्ज, गैस और बवासीर की समस्या से व्यक्ति को कोसों दूर रखता है।
मोटापा से बचाता है।
चाय या काफी की लत पड़ चुकी है तो सुबह उठकर बासी खाने की आदत डालें। कुछ ही दिनों में चाय या काफी की लत से छुटकार मिल सकता है।
अगर पेट में अल्सर की समस्या है तो सप्ताह में तीन दिन बासी खाने की आदत डालें, बहुत हद तक अल्सर से निजात मिल सकता है।
बासी व्यक्ति को दिनभर तरोताजा बनाए रखता है। इससे दिनभर काम करने के लिए एनर्जी मिलती है।

कब और किन्हें बासी से परहेज करना चाहिए
बासी को तो सभी उम्र के लोग ग्रहण कर सकते हैं, फिर भी कुछ अवस्थाएं और परिस्थितयां हैं, जिनमें बासी ग्रहण न करें तो शरीर के लिए अच्छा होगा।
सूर्यास्त के बाद
अधिक वर्षा या ज्यादा ठंड वाले दिनों में
अस्थमा के मरीज
सर्दी, जुकाम या श्वसन तंत्र के रोगों से पीडि़त मरीज
ज्यादा नींद आने की समस्या से ग्रस्त
दो वर्ष से कम उम्र के बच्चे
ठंडी स्थानों में रहने वाले लोग
अत्यंत गर्म भोजन का सेवन करने के तुरंत बाद
लंबी बीमारी से ठीक होने के बाद
धूप से तुरंत आने के बाद
गठिया या वात रोग से ग्रस्त व्यक्ति

बासी का पोषक मूल्य
बासी में मुख्य रूप से निम्र पोषक तत्वों का समावेश होता है –
कार्बोहाइड्रेट
आयरन
पोटेशियम
कैल्शियम
विटामिन्स, मुख्य रूप से विटामिन बी 12
खनिज लवण
जल
ताजे बने चांवल की अपेक्षा इसमें करीब 60 फीसदी कैलोरी ज्यादा होती है। संतुलित आहार उसे कहते हैं, जिसमें सभी पोषक तत्वों का उचित समावेश हो। इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो बासी पूर्ण रूपेण संतुलित आहार है। दूसरी ओर बासी के साथ हमेशा भाजी खाया जाता है। पोषक मूल्यों के हिसाब से भाजी में लौह तत्व प्रचुर मात्रा में विद्यमान रहते हैं। इसके अलावा बासी के साथ दही या मही का सेवन किया जाता है। दही या मही में भारी मात्रा मेें कैल्शियम मौजूद रहते हैं। इस तरह से सामान्य रूप से बात की जाए तो बासी किसी व्यक्ति के पेट भरने के साथ उसे संतुलित पोषक मूल्य भी प्रदान करता है।

बासी बनाने में सावधानियां
प्लास्टिक और एल्युमिनियम के बर्तन में कतई न रखें, क्योंकि इनमें मेटल होते हैं, जो शरीर के लिए नुकसानदेह हो कसता है।
इसे मिट्टी के बर्तन में भी नहीं रखना चाहिए, क्योंकि बर्तन में छेद होने के कारण हवा मेें मौजूद कई बैक्टीरिया बासी में घुल जाते हैं। हालांकि पके हुए काले रंग के मिट्टी की हांडी को बासी बनाने के लिए बेहतर माना जाता है।
स्टील के बर्तन उपयोग में ला सकते हैं।
रात भर इस रखना होता है, इसलिए इसे सुरक्षित रखने का जतन करें, ताकि कीड़े-मकोड़ों से भी बचा जा सके।
क बासी बनाते समय पका हुआ चांवल अगर आपस में चिपका सा है, तो इसे फोड़ लें।
बासी बनाने के लिए चांवल बनाने हेतु कुकर का उपयोग न करें तो बेहतर होगा। इसके लिए पसाए हुए चांवल ज्यादा अच्छे माने जाते हैं।
बासी बनाने के लिए हल्का सा चांवल को कड़ा पसायें।
क सुबह अगर बासी में हल्का सा झाग दिखाई दे रहा हो तो उस पानी को तुरंत निथार दें और उसमें नया पानी मिला दें।

बासी का डिब्बा
छत्तीसगढ़ में मजदूर और किसान की पहचान बासी है। मजदूर और किसान जब सुबह काम पर निकलते हैं तो बासी का सेवन करके निकलते हैं। इसके पीछे धारणा यह है कि इसे सुबह-सुबह तैयार करने का झंझट नहीं है। इसमें पानी की मात्रा भी खूब होती है, जिसके चलते धूप में काम करने के दौरान प्यास भी नहीं लगती। मजदूर और किसान अपने दोपहर के भोजन के लिए भी बासी का साथ में ले जाते हैं। इसके लिए विशेष प्रकार का बासी का डिब्बा होता है। यह डिब्बा आधुनिक टिफि न बॉक्स जैसा ही होता है, पर इसमें मुख्य स्थान गहरा होता है। इसमें बासी रखा जाता है। इसके उपरी भाग में हल्का खांचा बना होता है, जिसमें भाजी, प्याज और अचार वगैरह रखते हैं। इसके उपर ढक्कन लगाा होता है। इस डिब्बे में बाल्टी के हैंडल की तरह ही एक छोटा हैंडल लगा होता है। यह हैंडल इस डिब्बे को साइकिल के हैंडल में टांगने या फि र पकडक़र चलने के काम में आता है। पूरा डिब्बा जर्मन का बना होता है।
काम से घर वापसी के दौरान इसी बासी के डिब्बे में जरूरत का सामान जैसे सब्जी, बच्चों के लिए खाने की कुछ सामाग्री भी घर लायी जाती है।

बासी खाने का पात्र
बासी खाने के लिए एक चौड़े मुंह का कटोरा उपयोग में लाया जाता है। बासी को खाने के बाद या फि र-फि र बीच-बीच में पसिया को पीया जाता है, इसलिए इस कटोरा को इस ढंग से बनाया जाता है कि इसके किनारे धारदार न हो और आसनी से मुंह में लग जाए। यह कटोरा स्टील या बर्तन का बना होता है। इसे स्थानीय भाषा में बटकी कहते हैं। यह बटकी कई आकार में मिलती है। बासी के साथ भाजी या अचार खाने के लिए अलग से प्लेट का उपयोग किया जाता है, जिसे कटोरी कहते हैं। दही या मही को तो बासी में ही डालकर खाया जाता है। बासी के साथ प्याज को खाने के लिए इसे फांक के रूप में काट लेते हैं और बासी में ही डुबो देते हैं। फि र इसे आवश्यकतानुसार इसे खाते हैं। बिजौरी को भी आग में भून कर बासी के साथ सब्जी,अचार या चटनी की जगह खाते हैं। सूखे मिर्च को भी अंगरा में भूंन कर बासी के साथ खाया जाता है। लहसुन, सूखी मिर्च, नमक को सिलबट्टा में कूट कर चटनी बनाकर बासी के साथ खाया जाता है।
जब बच्चा नया-नया खाना सीखता है या फिर अत्यंत छोटा होता है तो माता के साथ ही बासी खाता है। एक ही कटोरे में एक तरफ माता और दूसरी तरफ बच्चा बासी खाता है। छत्तीसगढ़ की संस्कृति में इससे बढिय़ा वात्सल्य अभिव्यक्ति और क्या हो सकती है। यही नहीं बासी खाने के दौरान माता जब पसिया को पीती है, उसके पहले या बाद में बच्चे को भी पसिया पिलाती है।

आधुनकि तरीके से बासी
अगर आपको बासी खाना अच्छा लगता है और आप बासी खाना चाहते हैं। लेकिन मेहमानों या दूसरों के सामने या पुरातन पद्धति से हाथ डुबाकर खाना अच्छा नहीं लग रहा है तो कोई बात नहीं। आप एक नया तरीका अजमा सकते हैं। बासी को किसी कांच के फै शनेबल बाउल में ले लीजिए। पसिया को थोड़ा सा कम कर दें। इसमें थोड़ा सा ताजा दही, जीरा पाउडर, नमक व हरा धनिया पत्ता एड कर दीजिए। इसे आप चम्मच से भी खा सकते हैं। और अधिक स्वादिष्ट बनाना हो तो इसमें मिक्चर या गांठिया भी छिडक़ सकते हैं। ध्यान रहे मिक्श्चर या गांठियां के भींगने के पहले ही आपको खाना होगा। एक बार ऐसा अजमा के तो देखिए, बहुत मजा आएगा।

बासी छत्तीसगढिय़ों के जीवन में
समय बताने के लिए – बासी छत्तीसगढ़वासियों के जीवन में इतना घुला-मिला है कि समय बताने के लिए बासी का सांकेतिक उपयोग किया जाता है। जैसे दोपहर को एक या दो बजे का वक्त हुआ और किसी दूसरे व्यक्ति ने पूछा कि कितना बजा है, तो सामने वाला छत्तीसगढ़ी में तुरंत जवाब देता है, बासी खाय के बेरा हो गे। मतलब बासी खाने का समय है। सीधा सा अर्थ हुआ कि घड़ी की सुइयां एक या दो बजे का वक्त दर्शा रही हैं।
ठीक इसी तरह किसी से यह पूछा जाए कि सुबह कितने बजे काम पर आओगे, तो उसका छत्तीसगढ़ी में जवाब होता है, बासी खा के निकलहूं। इसका मतलब यह है कि बासी खा के निकलूंगा। यहां पर यह उल्लेखनीय है कि व्यक्ति भले ही बासी खाकर निकले या न निकले, सुबह आठ बजे का वक्त को बासी खाने का माना जाता है। इसलिए बासी खा के निकलने का मतलब हुआ कि वह व्यक्ति लगभग आठ बजे के आसपास निकलेगा।

मजदूरों को गिनने के लिए – सामान्यत: छत्तीसगढ़ में खेतों में काम करने वाले मजदूर किसी घने साजा, कोंटा या पलाश वृक्ष के नीचे एक लाइन से बासी के डिब्बे को रख देते हैं और खेतों में काम करने चले जाते हैं। खेत का मालिक दूर से ही इन डिब्बों को देखकर यह अनुमान लगा लेता है कि आज काम पर कितने मजदूर आए हैं। ठीक इसी तरह किसी भवन निर्माण के स्थान पर एवं खलिहान में भी मजदूर अपने बासी के डिब्बे को एक लाइन में रखकर अपना काम करते रहते हैं। इस तरह से कामगार लोगों की संख्या का आसानी से पता लग जाता है।

छुट्टी मांगने के लिए – स्कूलों में पढऩे वाले बच्चे दोपहर होते ही गुरूजी से चिल्ला कर कहते हैं कि बासी खाय बर जाहूं गुरूजी। इसका अर्थ यह हुआ कि बासी खाने जाना है, मुझे छुट्टी चाहिए।

कहावत के रूप में – बासी के नून नइ हटे। यह छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध कहावत है। इसका हिन्दी भावार्थ यह है कि बासी में मिला हुआ नमक नहीं निकल सकता। इसका उपयोग इस परिपेक्ष्य में किया जाता है जब किसी की प्रतिष्ठा चली जाए, तो फि र से खोयी हुई इज्जत वापस दुबारा नहीं आ सकती।

प्रेम के रूप में – दैनिक जीवन में बासी पति-पत्नी के प्रेम के प्रतीक के रूप में भी मान्य है। अक्सर पति बासी खाकर खेत में काम करने को चला जाता है। दोपहर में उसकी पत्नी बासी के डिब्बे को सिर पर रखकर खेत पहुंचती है। पलाश या बबूल के छांव तले पत्नी अपने कोमल हाथों से बासी, भाजी, चटनी और प्याज अपने मेहनतकश पति को परोसती है। पति ऐसा सुख पाकर सारी थकान भूल जाता है और दुगुने तेजी से काम में लग जाता है। इस तरह देखा जाए तो मूल छत्तीसगढिय़ों के जीवन में बासी मया अर्थात् प्रेम के प्रतीक रूप में है।
गुस्से के रूप में – किसी बात को लेकर पति-पत्नी के बीच अनबन हो जाए या मनमुटाव की स्थिति पैदा हो जाए, तो सामान्य जन-जीवन में देखा जाता है कि पति या पत्नी खाते हुए बासी को छोडक़र उठ जाते हैं और अपना क्रोध प्रकट करता है, हालांकि ऐसा कम ही देखने को मिलता है, क्योंकि भारतीय और छत्तीसगढ़ी संस्कृति दोनों में भी भोजन का अपमान नहीं किया जाता।

बासी के अन्य उपयोग
जानवरों के आहार के रूप में – बचे हुए बासी को खड़ी नमक के साथ जानवरों को दे दिया जाता है। जानवर इसे बड़े चाव से खाते हैं।

अंगाकर रोटी में – छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध रोटी के रूप में व्यंजन है – अंगाकर रोटी। इसमें चांवल आटे में बासी को निथार कर मिला देते हैं। इसे गूंथ लेते हैं और गरम तवे पर हल्का तेल लगाकर मोटाई लिए हुए हथेली की सहायता से थपड़ कर फैला देते हैं। सिंकते ही दूसरी तरफ इस रोटी को पलट देते हैं। इसे अचार या अलसी तेल के साथ बड़े चाव से खाया जाता है।

पाना रोटी में – उपर्युक्त विधि से ही रोटी बनाते हैं। अंतर यह है कि इसे केला पत्ता में लपेट कर सेकतें हैं, जिससे इसमें केले की सोंधी सुगंध समाहित हो जाती है। यह रोटी भी बड़े चाव से खायी जाती है।

फरा में – नये चांवल आटे में बासी को निथार कर गूंथ लेते हैं। हाथों से इसे मुठिया के रूप मे बना लेते हैं। एक चौड़े मुंह के बर्तन में पानी उबालते हैं और उसके मुंह को पतले कपड़े से बांध देते हैं। बनाए हुए मुठिया को इसके उपर रख देते हैं। इस तरह से ये भाप से सिंक जाते हैं। इसे टमाटर चटनी के साथ परोसते हैं। इसे छत्तीसगढ़ी इडली भी कह सकते हैं।

चिपकाने के लिए – पहले आजकल जैसे चिपकाने के गोंद, फेविकोल जैसे साधन उपलब्ध नहीं थे। कॉपी, पुस्तक, पोस्टर या किसी भी कागज को चिपकाने के लिए बासी को निथार कर उपयोग में लाया जाता था।
खिलौना बाजा में – मटकी को ढकने के लिए मिट्टी का ढक्कन जिसे मलिया या परई कहते हैं, इसके उपरी भाग में चारों तरफ मोटा कागज बासी की सहायता से चिपका दिया जाता है। सूखने पर पतली डंडियों की सहायता से इसे बजाया जाता है। यह बच्चों के गर्मी के दिनों का आम बाजा वाला खिलौना है। थोड़ी सी बासी को कागज चिपकाने के पहले मलिया में डाल दिया जाता है। बासी सूखने पर कड़ी हो जाती है। बच्चा जब डंडियों की सहायता से इस बाजा को बजाता है, तो छुन-छुन की विशेष ध्वनि पैदा होत होती है।

मंजा में – पतंग उड़ाने के लिए विशेष प्रकार का धागा बनाया जाता है, जिससे दूसरे की पतंग इसमें फंस कर कट सके। बासी को निथार कर आपस में खूब मसल देते हैं, फिर इसे धागे में चिपकाते चले जाते हैं। सुखने पर धागा अपने सामान्य अवस्था से कई गुना कड़ा हो जाता है।

फिल्मों में बासी
छत्तीसगढ़ राज्य बनने के पहले छत्तीसगढ़ी फिल्में तो उतनी नहीं बनी थीं, लेकिन राज्य बनने के बाद से छत्तीसगढ़ी फि ल्मों के निर्माण में काफी तेजी आई है। अधिकांश छत्तीसगढ़ी फि ल्मों में कुछ ऐसे दृश्य उभारे जाते हैं, जिसमें नायक बासी खाता दिखे। वहीं नायिका अपने मेहनतकश नायक के लिए खेतों की मेड़ से बासी पहुंचाती दिखे। यही नहीं, छत्तीसगढ़ी फि ल्मों में गाने का फि ल्मांकन भी बासी के परिदृश्य में किया जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है कि बासी से ही छत्तीसगढ़ की पहचान है। बटकी में बासी और चुटकी में नून अर्थात् नमक रखे हुए नायक या नायिका के फिल्मांकन से पूरे फिल्म में माटी की सोंधी खुशबू आने लगती है। दर्शक इसे देखकर भाव-विभोर हो जाते हैं और उन्हें पूरी फि ल्म अपने सांस्कृतिक परिदृश्य की लगने लगती है।
छत्तीसगढ़ी के कई गानों के एलबम में बासी का वर्णन प्रमुखता से किया गया है।

बासी की महत्ता
चिप्स, चॉकलेट सहित पेक्ड आइटम खाने वाले बच्चे कमजोर निकलते हैं, जबकि बासी और टमाटर चटनी वाले बच्चे हेल्दी होते हैं। 29 जुलाई 2019 को महिला एवं बाल विकास विभाग के वजन त्यौहार की रिपोर्ट में यह बात सामने आई। उनके रिपोर्ट के मुताबिक शहरी क्षेत्र के बच्चे कमजोर साबित हुए हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चे कहीं अधिक मजबूत हैं। महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा आंगनबाड़ी केंद्रों में पांच साल तक के बच्चों का वजन करवाया जाता है। कम वजन वाले बच्चों को चिन्हांकित कर उनके कुपोषण को कम करने के लिए उनको हर महीने आहार देकर कुपोषण के दायरे से बाहर लाना होता है। वजन करने के बाद बच्चों को तीन श्रेणी में रखा जाता है, मध्यम कुपोषित, अति कुपोषित व सामान्य बच्चों की अलग-अलग सूची बनाई जाती है। ताजा रिपोर्ट के मुताबिक शहरी क्षेत्र के बच्चे ज्यादा कमजोर निकल रहे हैं। जबकि ग्रामीण क्षेत्र में अब भी बच्चे मजबूत हैं। इसके पीछे वजह बताई गई है कि शहरी क्षेत्र में बच्चे नूडल्स, चॉकलेट, चिप्स जैसे खान-पान की चीजें ज्यादा पसंद करते हैं। रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि आंगनबाड़ी केंद्र हो या स्कूल, बच्चों के हाथों में ऐसी चीजों के पैकेट जरूर होते हैं। कामकाजी अभिभावक भी इसे सहुलियत समझते हैं। जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चे बासी और टमाटर चटनी खाकर ही आंगनबाड़ी केंद्र या स्कूल पहुंचते हैं। दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों के पहुंच से चिप्स, चॉकलेट जैसी चीजें पहुंच से दूर होती हैं या फि र उनके अभिभावकों का बजट इस हेतु अनुमति नहीं देता है। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों के पास बासी-चटनी के अलावा विकल्प नहीं होता है। यही कारण है कि ग्रामीण अंचल में बच्चों का शारीरिक विकास शहरी बच्चों की तुलना में बेहतर होता है।

बासी वर्तमान परिदृश्य में
वर्तमान परिदृश्य में आधुनिक पढ़े-लिखे लोग बासी से आशय बासा अर्थात् सड़े भोजन से लगा लेते हैं। इसके पीछे महत्वपूर्ण कारण यह है कि छत्तीसगढ़ी भाषा में बासी एक व्यंजन है, जबकि हिन्दी भाषा में बासी का अर्थ दूषित भोजन से है। सामान्य घरों में भी अब बासी देखने को नहीं मिलता। भले ही गर्मी के दिनों में कई लोग बासी खाते दिख जाते हैं। बासी न खाने के पीछे कई कारण हैं। आजकल कई प्रकार के नाश्ता आसानी से उपलब्ध हैं, जिसके कारण लोग बासी की जगह नाश्ता और गर्म पदार्थों का सेवन करने में रूचि दिखाते हैं। छत्तीसगढ़ में खायी जाने वाली अलग-अलग प्रदेशों में भी बासी बनायी और खायी जाती है, पर उसका नाम अलग-अलग है।
छत्तीसगढ़ शासन के सहयोग से संचालित हो रहे छत्तीसगढ़ी पारंपरिक व्यंजन स्वाद केंद्र गढक़लेवा में अगर बासी उपलब्ध हो तो युवा वर्ग इस व्यंजन से परिचित हो पायेगा, वहीं इसके स्वाद के शौकीन बासी खाकर अपना पेट भी भर सकेगें और पसिया पीकर गले को तर भी ।

विरोध प्रदर्शन में बासी
सुनने में थोड़ा अजीब लगता है, विरोध प्रदर्शन के रूप में बासी। पर ये हकीकत है और ऐसा हुआ भी है। चटनी बासी खाकर जिला शिक्षा कार्यालय के सामने पालकों के साथ दिन भर धूप में अमलोर स्कूल में विद्यार्थी डटे अपनी बातों को मनवाने के लिए डटे रहे। महासमुंद ब्लॉक के अमलोर हाईस्कूल के बालक-बालिका और पालकों ने 1 नवंबर 2019 को जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय का घेराव कर दिए। विद्यार्थी अपना बस्ता जिला शिक्षा अधिकारी को सौंपना चाह रहे थे। यूं तो इस तरह के अनेक प्रदर्शन होते रहते हैं। लेकिन यह अपने तरह का अनूठा प्रदर्शन रहा। क्योंकि सारे विद्यार्थी और पालक अपने-अपने घर से पूरी तैयारी के साथ बासी, कटोरा और चटनी लेकर पहुंचे थे। सारे विद्यार्थी और पालकों ने जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय के भीतर बासी, चटनी खाई और स्कूल में शिक्षक की नियुक्ति की मांग करने लगे। अमलोर के हाई स्कूल में 115 बच्चे अध्ययनरत हैं लेकिन वहां पढ़ाई के लिए एक भी शिक्षक नियुक्त नहीं थी। इस बाबत विद्यार्थी और परिजनों को इस तरह का कदम उठाना पड़ा। हालांकि इस प्रदर्शन के पहले भी विद्यार्थियों और पालकों ने शिक्षकों की नियुक्ति बाबत कई दफे प्रशासन से गुहार लगाई थी, लेकिन नतीजा सिफ र ही रहा था। बासी, चटनी के साथ प्रदर्शन करने का प्रशासन पर ऐसा असर हुआ कि तुरंत ही दो शिक्षकों की नियुक्ति आदेश जारी कर दिया। साथ ही आश्वासन दिया गया कि बहुत जल्द ही और शिक्षकों की नियुक्ति की जायेगी। प्रदर्शन में उपस्थित पालक और विद्यार्थियों ने कहा था कि हम शांतिपूर्ण ढंग से अपने छत्तीसगढिय़ा व्यंजन बासी चटनी खा के प्रदर्शन कर रहे थे। आखिर बासी ने दम तो दिखाई।

बासी और राजनीति
छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री और जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ के संस्थापक एवं सुप्रीमो अजीत जोगी अब स्वर्गीय ने प्रदेशव्यापी खेत चलो अभियान का शुभारंभ मुजगहन से किया था। उन्होंने किसानों के बीच जाकर उनके साथ पहले बासी खाया और कृषि कार्य में हाथ बंटाया। छत्तीसगढ़ राज्य में पहले दफे था जब किसी राजनेता ने इस तरह से बासी खाकर माहौल बनाया हो। अजीत जोगी ने पहले बासी, चटनी, प्याज, नींबू का अचार और आलू भटे की सब्जी खाई। जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ के सुप्रीमो अजीत जोगी के इस कार्यक्रम खेत चलो अभियान का मुख्य उद्देश्य किसानों को उनका वाजिब हक दिलाना था। किसान बासी खाते हैं और किसानी करते हैं, इसलिए वे स्वयं और उनके पार्टी के पदाधिकारी और कार्यकर्ता खेतों में जाकर किसानों के साथ बासी चटनी खाकर किसानी कार्य कर अनोखे ढंग का प्रदर्शन कर रहे हैं।

पारिभाषिक शब्दावली
बासी – यह साधारण प्रकार की बासी है। इसमें रात के पके चांवल को पानी और मांड़ के साथ रात भर भिंगों कर रख देते हैं। सुबह इसका सेवन किया जाता है।

पखाले बासी – सामान्य रूप से बासी को सुबह खाया जाता है। खाने के बाद बचे बासी और खराब न हो, इसलिए इसके पानी को निथार देते हैं, फिर इसे स्वच्छ जल में धो देते हैं। इसके बाद इसमें पानी डालकर पुन: कुछ समय बाद खाने हेतु तैयार कर लिया जाता है।

पेज – यह कुछ-कुछ बासी का ही रूप है, लेकिन इसकी खासियत यह है कि इसे रात भर नहीं रखा जाता। चांवल को तब तक पानी के साथ पकने देते हैं, जब तक उसमें से लसफ स की आवाज सुनाई देना प्रारंभ हो जाए। फि र कुछ ज्यादा ही मांड़ के साथ थोड़ा ठंडा होने के लिए रख देते हैं, इसे पेज कहते हैं।

महीरी – पेज को चूल्हे से उतारने के ठीक पहले उसमें मठा डाल देते हैं। ठंडा होने पर उसे खाते हैं।

तियासी बासी – साधारण रूप से बना बासी अगर दूसरे दिन भी बच जाए, तो इसे तीसरे दिन के लिए रख देते हैं, इसे ही तियासी बासी कहते हैं। इसमें खट्टापन आ जाता है। यह पाचन में गरिष्ठ हो जाता है। तियासी बासी को शारीरिक रूप से पुष्ट व्यक्ति ही पचा पाता है। कई बार यह बासी को पालतू पशुओं के लिए ही बनायी जाती है, इसे उनके लिए पौष्टिक आहार माना जाता है।

धोवा बासी – दिन में पके हुए बचे चांवल को एक बार धोकर निथार देते हैं। फि र उसमें नमक डालकर गरम-गरम खाया जाता है, इसे ही धोवा बासी कहते हैं।
बोरे बासी – चांवल पका कर जब वह ठंडा हो जाए तो उसमें पानी डाल कर रख देते हैं। कुछ समय बाद इसे चाव से खाया जाता है।

बासी कुछ तथ्य
बासी के संग प्याज खायी जाती है। लेकिन प्याज काटने का अंदाज कुछ अलग होता है। एकदम से सलाद के समान टुकड़े में या गोल-गोल तरीके से प्याज को नहीं काटा जाता। बल्कि बड़े-बड़े आकार में ही प्याज को काटा जाता है। कभी-कभी तो केवल छिलके उतार कर ही प्याज को बासी के साथ खाने के लिए उपयोग में लाया जाता है।
प्याज को बासी के साथ खाने के लिए अलग से बरतन में न रखकर कटोरे में ही डाल देते हैं।
बासी के संग सब्जी या अचार खा रहें तो बार-बार सब्जी या अचार को खाने से और उसी हाथ से बासी को खाने से पसिया थोड़ा गंदला जाता है, ऐसे में पसिया को निथार कर फेंक देते हैं और दूसरा पानी डाल देते हैं।
घर में अगर पांच सदस्य हैं तो सभी के उम्र के अनुसार अलग-अलग आकार का कटोरा बासी खाने के लिए रखा जाता है।
बासी खाने का कटोरा कुछ इस तरह का लिया जाता है कि उसमें पसिया भी पीते बन जाए। बारा वाला कटोरा इसके लिए उपयोग में लिया जाता है।
कभी-कभी थोड़ा सा बासी खाया जाता है, उसके बाद अंगाकर रोटी या चांवल भी खा लिया जाता है।
बासी खाने के लिए पुराने अचार की जगह तुरंत डाले गए अचार नूनचरा का उपयोग स्वाद में बढ़ोत्तरी कर देता है।
कुछ लोग बासी के साथ नमक डालते हैं और कुछ बिना नमक का खाते हैं।
पहले बासी खाने के लिए डल्ला नमक जिसे खड़ा नून कहते हैं का उपयोग किया जाता था।
बचे भात से बासी बनाने वाली बात नहीं है। अधिकांश घरों में बासी बनाना है, इस हेतु चांवल को उसी अनुपात में भात बनाया जाता है।
बासी बनाने के लिए चांवल को थोड़ा सा कड़ा पसाया जाता है।
कुकर से बने चांवल से बासी अच्छी नहीं बन पाती। बासी बनाने के लिए पसाए हुए चांवल का ही उपयोग किया जाता है।
कभी-कभी अधिक गर्मी हो जाने से सुबह बासी के पसिया में थोड़ा सा गाजा या फे न आ जाता है। ऐसा होने पर पसिया को निथार कर नया पानी डाल दिया जाता है। कहने का मतलब किसी भी हालत में बासी खराब नहीं हो पाती।
ग्रामीण अंचलों में बासी को नीचे बैठकर ही खाया जाता है। शहरी इलाकों में भी बासी खाना हो तो बैठकर खाने से ही उसका स्वाद आ पाता।

कविता में बासी
छत्तीसगढ़ के अनेक कवियों ने अपनी कविता में बासी को विषय-वस्तु या आधार बनाया। किसी कवि ने बासी की महिमा का बखान किया तो किसी ने बासी के बहाने मेहनत और जिंदगी की ओर रूख किया।
क छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध लोकगीत ददरिया में बासी की महत्ता का बखूबी वर्णन है।
बटकी मा बासी अउ चुटकी मा नून,
मंय गावथ हों ददरिया, तंय कान दे के सुन।

जन कवि कोदूराम दलित के कुण्डलिया छन्द में बासी का वर्णन –
बासी मा गुन हे गजब, एला सब झन खाव।
टठिया भर पसिया पियौ, तन ला पुष्ट बनाव।।
तन ला पुष्ट बनाव, जियो सौ बछर आप मन
जियत हवयँ जइसे कतको के बबा-बाप मन।
दही-मही सँग खाव शान्ति आ जाही जी मा
भरे गजब गुन हें छत्तिसढ़ के बासी मा।।

जनकवि लक्ष्मण मस्तुरिया जी के सुप्रसिद्ध गीत चल चल गा किसान बोए चली धान असाढ़ आगे गा, में बासी का वर्णन है –
धंवरा रे बइला कोठा ले होंक रै,
खा ले न बासी बेरा हो तो गै।

कवि रविशंकर शुक्ल के सुप्रसिद्ध लीम अउ आमा के छाँव, नरवा के तीर मोर गाँव के एक पद बासी को समर्पित है।
खाथ्ंव मँय बासी अउ नून,
गाथंव मँय माटी के गुन,
मंय तो छत्तीसगढिय़ा आँव।

कवि विमल कुमार पाठक के कविता बोरे बासी में बासी का सुंदरता के साथ वर्णन –
छानी चूहय टप टप टप टप,
परछी मं सरि कुरिया मा।
बोरे बासी रखे कुंडेरा मा,
बटुवा मं, हडिय़ा मा।

कवि पीसी लाल यादव के गीत मा गँवई में बासी का वर्णन –
चांवरा में बइठे बबा, तापत हवै रऊनिया।
चटनी बासी झडक़त हे, खेत जाय बर नोनी पुनिया।।
क कवि रघुवीर अग्रवाल पथिक के कविता में बासी का सुंदर प्रयोग हुआ है।
जनम धरे हन ये धरती मा, इहें हवा पाए हन।
गुरमटिया चाँउर के बासी, अउ अँगाकर खाए हन।।
क मनीराम साहू मितान के रचना मा बासी –
हांस के करथे पहुनाई,
एक लोटा पानी मा।
बटकी भर बासी खवाथे,
नानुक अथान के चानी।
कभू तसमई कभू महेरी,
भाटा खोइला मही मा कढ़ी जी।

कवि ज्ञानुदास मानिकपुरी के घनाक्षरी के अंश में बासी के महिमा का वर्णन –
नांगर बइला साथ, चूहय पसीना माथ।
सुआ ददरिया गात, उठत बिहान हे।
खाके चटनी बासी ला, मिटाके औ थकासी ला।
भजके अविनासी ला,बुता मा परान हे।

दुर्गाशंकर इजारदार के कविता में बासी –
अड़बड़ लगथे घाम, चैत जब महिना आथे।
रोटी ला जी छोड़, सबो झन बासी खाथें।

दिलीप कुमार वर्मा के कुण्डलिया छन्द के अंश में बासी के प्रयोग –
खा के चटनी बासी रोटी अब्बड़ खेलन।
गजब सुहाथे रोटी बेले चौकी बेलन।

असकरन दास जोगी के उल्लाला छन्द में बासी का वर्णन –
बोरे बासी खास हे, खाना पीना नीक जी।
गरमी लेथे थाम गा, होथे बोरे ठीक जी।।

चोवाराम बादल के रोला छन्द में बासी का वर्णन –
बासी खाय सुजान, ज्ञान ओखर बढ़ जावय।
बासी खाय किसान, पोठ खंती खन आवय।
बासी पसिया पेज, हमर सुग्घर परिपाटी।
बासी ला झन हाँस, दवा जी एहा खाटी।।

कवि जितेन्द्र वर्मा के गीतिका छन्द में बासी के वर्णन –
चान चानी गोंदली के, नून संग अथान।
जुड़ हवै बासी झडक़ ले, भाग जाय थकान।
बड़ मिठाथे मन हिताथे, खाय तौन बताय।
झांझ झोला नइ धरे गा, जर बुखार भगाय।।

कवि जितेन्द्र वर्मा के आल्हा छन्द में बासी के वर्णन –
तन ला मोर करे लोहाटी, पसिया चटनी बासी नून।
बइरी मन ला देख देख के, बड़ उफान मारे गा खून।।

युवा छन्द साधक हेमलाल साहू के गीतिका छन्द के अंश में बासी का वर्णन –
लान बासी संग चटनी, सुन मया के गोठ गा।
खा बिहिनिया रोज बासी, होय तन हा पोठ गा।।
क आशा देशमुख के चौपाई छंद में बासी का वर्णन –
आमा लिमउ अथान बना ले,
बासी भात सबो मा खा ले।

छन्द साधिका वसंती वर्मा के चौपाई छन्द में बासी का वर्णन –
लाली भाजी गजब मिठाथे,
बासी संग बबा हर खाथे।

कवि रमेश कुमार सिंह चौहान के एक गीत के हिस्सा में बासी का वर्णन –
जुन्ना नाँगर बुढ़वा बइला, पटपर भुइँया जोतय कोन।
बटकी के बासी पानी के घइला, संगी के ददरिया होगे मोन।।

प्रसिद्ध कवि और छन्द साधक अरुण कुमार निगम के छन्द में बासी के महिमा का सुंदर वर्णन –
मंय बासी हौं भात के, तँय मैदा के पाव।
मंय गुनकारी हौं तभो, तोला मिलथे भाव।।
(दोहा)
बरी बिजौरी के महिमा ला, पूछौ जी छत्तिसगढिय़ा ला।
जउन गोंदली-बासी खावैं। सरी जगत बढिय़ा कहिलावैं।।
(चौपाई)
छत्तिसगढिय़ा सबले बढिय़ा, कहिथैं जी दुनियाँ वाले।
झारा-झार नेवता भइया, आ चटनी-बासी खा ले।।
(ताटंक)
माखनचोर रिसाय हवे कहिथे नहिं जावँ करे ल बियासी,
माखन नाम करे बदनाम अरे अब देख लगे खिसियासी।
दाइ जसोमति हाँस कहे बिलवा बिटवा तँय छोड़ उदासी,
श्री बलराम कहे भइया चटनी सँग खाय करौ अब बासी।।
(सवैया) (झाँपी से साभार)

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