Thursday, June 17th, 2021

EDITOR’S VIEW – तंग जिंदगी और कोरोना के साये में वक्त बदलने की चुनौती

CG NHI, EDITOR’S VIEW,

आज पूरा विश्व जिस संकट से गुजर रहा है उससे सबको साथ मिलकर निपटने की जररूत है।  हर व्यक्ति यदि इसे राष्ट्रीय संकट के रूप में जानकर योगदान करे तो पूरे  देश को इस समस्या से निजात मिलने में देरी नहीं लगेगी।  जहां तक भारत का सवाल है तो भारत में यह  कोरोना महामारी विकराल स्वरूपं में दूसरी बार उपस्थित हुई है। इसका नतीजा  यह हुआ है कि फिर  देश को अपनी रफ़्तार कम करनी पड़ी है।  महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, में यह समस्या अति घनघोर है।  यह किसी ने कभी भी कल्पना नहीं की थी की ऐसे बुरे दिन राष्ट्र के ऊपर आएगा जिसका न तो सिर है और न ही पैर है । बस एक अन्धविश्वास की तरह यह महामारी हवा में तैर रही है और लोगों की जाने भी जा रही है। इससे निपटने लॉकडाउन का रास्ता अपनाया जा रहा है। पिछले साल तो प्रधानमंत्री ने देश में पूर्ण लॉकडाउन  किया और देश की सांसे पूरी थम गई थी।

करोड़ो लोग अपनी नौकरी पेशे से छूट गए।  घर परिवार में रोजी रोटी का संकट समा गया।  बच्चों के स्कूल , शिक्षा ,पढाई लिखाई  सब बंद हो गए। स्कूल कालेज आज भी बंद है। यह दर्द देश की छाती से ख़त्म भी नहीं हुआ था कि कोरोना की दूसरी लहर देश में आ गई है जो पहले से कहींअधिक खतरनाक और नुकसानदायक है ।आज इससे निपटने की बड़ी चुनौती है। यह महामारी ऐसी विषैली है कि इसमें कोई भी व्यक्ति प्रयत्क्ष सहयोग करने से बचना चाहता है। पड़ोस का कोई व्यक्ति बीमार है तो उसका पडोसी आज उसे किसी भी तरह से मदद करने से दूर भागता है। जबकि इंसान का कर्तव्य तो इंसानियत में ही है। आज सब अपनी इंसानियत भूलकर केवल अपनी सुरक्षा के लिए लड़ रहे हैं।  यह स्थिति कितनी खतरनाक है इस बात से अनुमान लगाया जा सकता है कि आज पति पत्नी भी एक दूसरे को प्रत्यक्ष सहयोग करने से भागने लगे हैं । जिन लोगों ने अग्नि के समक्ष सात फेरे लेकर सात जन्मों के लिए साथ देने का संकल्प लिया था उनका संकल्प कोरोना ने तोड़ दिया और इसी जन्म में ही पति पत्नी एक दूसरे से दूरियां बनाकर रहना चाहते हैं । क्या यह सच्चाई नहीं है ? इसे हम जिस नजर से देखेंगे वैसा ही दिखेगा । यह प्रलय कतई नहीं है बल्कि यह विश्वास को मजबूत बनाने का दौर है।  इसमें टूटने की जरूरत नहीं है बल्कि इससे निपटने की जरूरत है ।

पूरा देश इससे जूझ  रहा है। पर यह कोई प्रयत्क्ष दिखाई नहीं दे रहा । यह हवा में तैरती बीमारी है और हवा में ही बह जाएगी । बशर्तें हम किसी से ऐसी दूरियां न बनाये की वह आपके सामने तड़फ तड़फ कर मर जाये।  मानवीयता का खजाना जहां खत्म होगा प्रलय वहीं आएगा। भारत में संवेदनशीलता और मानवीयता का पाठ गौतम बुद्ध से लेकर गाँधी तक ने पढ़ाया है। इसलिए चाहे कितना भी बुरा दौर क्यों न हो संवेदनशीलता, मानवीयता और मनुष्यता को त्यागने की जरूरत नहीं है । लोगों की मदद हम वैसा ही करते रहें जैसा पहले करते थे, उन्हें संकट के समय रास्ते पर कतई अकेला न छोड़े । यह ठीक है कि कोरोना गाइडलाइन हमें सीधे संपर्क की इजाजत नहीं देती  पर वह संवेदना खत्म करने भी नहीं बोली है। संवेदना तो बनाये रखिये और मदद जारी रखिये । मानव सेवा ही बड़ा धर्म है। कोविड 19 मानव सेवा धर्म में परीक्षा की तरह उपस्थित है । इसमें उत्तीर्ण होने की जरूरत है । ठीक है किसी से हम एकदम प्रत्यक्ष न मिलें लेकिन उनको अकेला भी न छोड़े जहां तक हो सके हर हालत में उनके साथ रहे ,अर्थ,कर्म और धर्म से उनको सहारा दे । क्योकि यह विपत्ति कब अपने साथ भी आ जाये कह नहीं सकते तब हम भी संघर्ष में अकेले पड़ जायेंगे । इस संघर्ष को झेलने में सबको साथ रहकर ताकत बढ़ानी होगी ।

घर पर लॉकडाउन में रहें पर कोई भूखा तो आसपास नहीं सोया है उसका भी ध्यान रखें। लॉकडाउन में घर पर रहें पर कोई यदि अस्पताल ले जाने लायक है तो उसके लिए एम्बुलेंस ,दवाई, पैसे आदि में मदद करें। लॉकडाउन में घर पर रहें पर कोई कुछ मदद चाहता है तो उसको हर सम्भव मदद करें। क्योकि यह वक्त  संघर्ष करने का है और सबको मिलकर संघर्ष करने का है । यह दौर बहुत कुछ सीखा जायेगा इंसान को।  जिंदगी तो पहले से तंग चल ही रही थी इस बुरे दौर ने और बेहाल कर  दिया इस अफ़्सोस में न रहें बल्कि वक्त बदला है और इस वक्त को बदलने की क्षमता अपने भीतर पैदा करें । कोरोना कोई वेक्सीन से भाग जाएगी ऐसा नहीं है हमें अपने भीतर  एक नए आत्मविश्वास पैदा करना होगा तभी हमारे अंदर भी कोरोना से लड़ने प्रतिरोधक क्षमता पैदा होगी । दरअसल कोरोना बीमारी से अधिक मनुष्य के अंदर घर करने वाली एक ऐसी महामारी व्याप्त है जो लोगों को  विवेक शून्य कर देती है । पर इसका दोषारोपण आखिर किसको दे  ?  विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ही इस महामारी के अनेक तरह के लक्षण बताकर यह सुनिश्चित कर  दिया था की इससे जान चली जाएगी। विश्व में हल्ला यह यह हुआ कि इसकी कोई दवाई  नहीं है । सारे देशों ने अपने वैज्ञानिक इसके वेक्सीन की खोज के लिए लगा दिए । अब भारत में भी वेक्सीन तैयार हो रही है और टीकाकरण का अभियान भी चल रहा है । इसके दो डोज तैयार किये गए हैं और भारत में अभी ४५ साल के ऊपर के लोगों को ही वेक्सीन लगाई जा रही है । जबकि यह बीमारी महज सर्दी खांसी का स्वरुप है । यह तो पहले भी होता रहा है । सर्दी खांसी पूरे विश्व में आम बीमारी की तरह ही रही है ।अबजब इसका स्वरूप कोरोना के रूप में बदला है तब इसका चेहरा विषैला और वीभत्स हुआ है ।

खैर विश्व स्वास्थ्य संघटन   ने इसके बचाव के लिए भी काफी तकनीक निकाले हैं जिस पर काम अभी भी चल रहा है । इसकी जो गाइडलाईन है उसे ध्यान से समझने की जरूरत है और उसे ईमानदारी से निभाने की भी जरूरत है । रह रह कर साबुन से हाथ धोना , दो गज की दूरियां मेंटेन करना और मास्क लगाने जो नियम बने हैं उसे भूलने से नुक्सान हो सकता है । इस गाइडलाइन के अनुरूप अगर चलते रहेंगे तो कहीं कोई तकलीफ नहीं रहेगी ।  अभी जो कोरोना में घमासान हुआ है वह गाइडलाइन के उललंघन से भी हुआ है । फिर एक साल में इसका स्वरुप भी बदलता रहा है । पहले जो कोरोना के लक्षण बताये गए थे वह अब भी प्रासंगिक है लेकिन उसके स्वरुप में अब फिर से इजाफा हुआ है । अब केवल सर्दी, खांसी, ,छींक, बुखार, सिरदर्द उलटी आदि भी लक्षण में शामिल हो गए हैं। इसलिए इस पर बहुत ज्यादा सावधानी की भी जरूरत है ।

अगर सावधानी रखी जाएगी तो इस महामारी पर विजय पाना आसान हो जायेगा । सरकारें अपने अपने स्तर पर इस महामारी से लड़ने बचने के उपायों पर काम कर रही है पर जब तक हम खुद अनुशासित नहीं होंगे तब तक किसी महामारी में नियंत्रण करना कठिन हो जायेगा। बेहतर होगा हम सावधानी बरतें और हर कदम पर सावधानी बरतें, दूसरों को भो सावधान करे । इसके नियंत्रण में सरकार के साथ सहयोग करें । यह जितनी जल्दी जाएगी दुनिया सुकून का साँस लेगी । आज बच्चों का शिक्षण एक साल से बंद है । लोगों की रोजी रोटी एक साल से प्रभावित है । हजारों लोगों की नौकरी जा चुकी है । देश की अर्थ व्यवस्था चौपट हो चुकी है । यह कितना बड़ा नुक्सान है। उसे फिर से पटरी पर लाना है । देश की लूटी हुई खुशहाली वापस लाना है। यह जवाबदारी केवल सरकार की नहीं है बल्कि प्रत्येक नागरिक की है । यह दौर वक्त ने बदला है अब वक्त बदलने का दौर हमें लाना है। आज पूरे देश में उथल पुथल है किसी को यह समझ नहीं आ रहा है किआखिर इस महामारी का अंत कैसे होगा । लेकिन इसके उपायों पर तेजी से सारे राज्य काम कर रहें हैं । देश के अधिकांश राज्यों में लॉकडाउन है । छत्तीसगढ़ में भी 29 में से २०  जिलों में लॉकडाउन है । यहां हालत बेक़ाबू है । महामारी तेजी से फ़ैल रही है और दवाइयों का स्टॉक ख़त्म हो गया है।

कहीं इंजेक्शन नहीं है तो कहीं  दवाई नहीं है। बेड तो किसी भी जगह खाली नहीं है यहां तक निजी अस्पतालों में भी बेड खाली नहीं है । निजी अस्पतालों में जो  शुल्क लिए जा रहे हैं उससे आंखे फ़टी की फ़टी रह जाएगी । कल राज्य सरकार ने इस पर लगाम कसने निजी अस्पतालों के कोरोना पेसेंट के इलाज के लिए दरें निर्धारित की है। अब निजी अस्पतालों में कोरोना के अति गंभीर मरीज को रोज के सत्रह हजार रूपये लगेंगे ।आपको बता दे यह सत्रह हजार भी शुल्क सामान्य लोगों के लिए उनके बजट से बाहर है । डाक्टर निर्धारित करने के बावजूद निजी अस्पतालों में शुक्ल किसी दूसरे मद में डालकर निकाल लेते हैं । अभी दौर जो है सिर्फ जान बचाने की है इसलिए हर व्यक्ति अपना सब कुछ लूटाकर निजी अस्पतालों में पैसा फूक रहें हैं । अब भारत के चिकित्स्कों को भी यह समझने की जरूरत है कि जो जनता डॉक्टर को भगवान का रूप समझती है वह उसके ऊपर से विश्वास न खोये । आज का समय परस्पर सहयोग कर चलने का है तभी देश का भला हो सकता है ।

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