Education : शिक्षा में गुणवत्ता लाने शिक्षाविदों की माने सरकार , समान शिक्षा पर हो काम

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Education : शिक्षा में गुणवत्ता को लेकर पिछले बीस सालों से चर्चा चल रही है पर उस चर्चा का रिजल्ट अब तक जीरो ही रहा है

Education : चाहे केंद्र की बात करें या राज्य सरकार की सब अपने अपने मियां मिट्ठू बनते हैं ।

केंद्र में पिछले 9 साल से मोदी सरकार काबिज है और उसने शिक्षा को अधिक प्रभावशाली और सरल बनाने के लिए नई शिक्षा नीति भी लाई है ।

पर राजनीतिक पैत्रेबाजी के चलते उसका तानाबाना अलग हो गया है । कोई मानता है कोई नहीं मानता है । शिक्षा को भी घर का व्यवसाय जैसा बना लिया गया है ।

जब चाहे दुकान खोल लें और जब चाहे दुकान बंद कर लें । इसके लिए किसी ज्ञानी की कोई जरूरत नहीं है । शिक्षा में गुणवत्ता लाने शिक्षावीदों से मिलना

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चाहिए उनसे बात करनी चाहिए फिर उस पर विचार मंथन करके लागू करना चाहिए । पर होता इसके ठीक उलट है । ज्ञानी ध्यानी धरे रह जाते हैं और अज्ञानी के हाथ में कमान चली जाती है ।

कोई पाठ्यक्रम में अपने पूज्यनीय नेता का कोर्स डालते हैं तो दूसरी राजनीतिक पार्टी आती है तो वह अपने पूज्यनीय नेता का कोर्स डालती हैं ।

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किसे पढ़ना है या नहीं पढ़ना है क्या इसे राजनीतिक दल तय करेंगे ? नहीं, लेकिन करते वही हैं । शिक्षविद् से तो दूर दूर का भी रिश्ता नहीं रखना चाहते हैं ।

छोटे छोटे बच्चों की पीठ पर दस किलो बस्ता का बोझ डालने से लगता है कि शिक्षा में गुणवत्ता आ गई है । यह हमारी शिक्षा नीति हो गई है ।

जीतने महंगे स्कूल की फीस होगी उतनी अच्छी शिक्षा मानी जाती है । यही कारण है कि देश के तमाम सरकारी स्कूल पिछड़ गए हैं जबकि वेतन

शिक्षकों को जमकर दिया जाता है । दरअसल निजी स्कूलों के प्रचलन ने सरकारी स्कूलों का दिवालिया निकाल दिया है । हमारे यहां सबसे बड़ी कमजोरी है शिक्षा

में समानता नहीं है । गरीब अमीर सबका गुरु तो एक ही होना चाहिए । सबका स्कूल भी एक ही होना चाहिए और सबकी शैक्षणिक सुविधाएं भी एक जैसी ही होनी चाहिए ।

लेकिन हमारे देश में अमीरों के लिए राजकुमार जैसे कालेज खुले हुए हैं और गरीबों के लिए सरकारी स्कूल ही ठिकाना है ।

अब थक हार कर राज्य सरकारें सभी सरकारी स्कूलों में शैक्षणिक शुल्क खत्म कर दिए हैं फिर भी निजी स्कूलों का रुख खत्म नहीं हुआ ।

अगर शुल्क माफ हो गया तो यह मान लिया जाता है वहां कोई अच्छी पढ़ाई नहीं होगी । इससे निजी स्कूल को और लाभ मिलने लग गया है ।

शिक्षा में गुणवत्ता के लिए ऐसे ही और भी कई प्रयोग हुए हैं । कभी बोर्ड परीक्षाएं खत्म करना तो कभी स्कूलों के समय में परिवर्तन करना ।

पर सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की जो कमी है उसे दूर करने की कोई कोशिश नहीं होती है । सरकार किसानों का धान बेतहाशा खरीद रही है ।

उनके कर्जे माफ कर रही है ।उनको मुफ्त में बिजली पानी दे रही है बावजूद किसान केवल मोटा धान बेचने के लिए उगा रहा है ।

खाने के लिए धान उगाना बंद कर दिए हैं । पर सोचिए सरकार बच्चों के भविष्य के लिए, शिक्षा के लिए क्या कर रही है । हरेक राज्य में

कम से कम तीन से पांच हजार शिक्षको के पद खाली पड़े हैं । हरेक राज्य में करीब करीब आधे से अधिक स्कूलों की छत जर्जर है ।

कई जगह तो बच्चों के बैठने का ही ठिकाना नहीं है । शिक्षण सामग्री नहीं है । व्यायाम टीचर नहीं है । निजी स्कूल ये सब सुविधाएं दे रहें हैं ।

आज उनके पास ऐसी रूम है ।एक नंबर टेबल कुर्सी , तमाम सुविधाओं से भरा लैब,

लाइब्रेरी,खेल मैदान,खेल सामग्री सब कुछ है । इसलिए फीस भी तगड़ी लेते हैं ।

जबकि सरकारी स्कूलों के शिक्षक की तनख्वाह ज्यादा होती है । फिर भी सरकार ऐसा क्यों नहीं कर सकती । यह समझ से परे है ।

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शिक्षा में वास्तव में गुणवत्ता लाना है तो तमाम चोचले बाजी छोड़कर शिक्षविदों के हाथ में शिक्षा को सौंप दें ।

शिक्षा वीदों की एक कमेटी बनाए उनके सुझाव पर अमल करें ।

शिक्षा में भारी भरकम बजट रखें और उस पर शिक्षाविदों के मुताबिक स्वतंत्र काम होने दें ।

सरकार अपने स्कूलों को समर्थ और सशक्त बनाए ,

निजी स्कूलों को त्याग करना सीखे,शिक्षाविदों को महत्व दे तो निःसंदेह शिक्षा में गुणवत्ता लौटेगी ।

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