Artical : हाउथी विद्रोह : क्या है सच –  तुहिन

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पिछले चार महीनों से अधिक समय से गाज़ा में इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों के खिलाफ जनसंहार और नस्लीय सफाया पर पूरा विश्व जनमत व्यथित है।पूरी दुनिया में फासिस्ट युद्ध अपराधी ज्योनवादी हत्यारा इजरायल और उसके सरपरस्त अमरीकी व ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं । इन समाचारों के बीच यमन के होउथी विद्रोहियों द्वारा इजरायल को तुरंत गाज़ा समेत पूरे फिलिस्तीन पर हमले बंद करने की चेतावनी के साथ इजरायल के खिलाफ मिसाइल दागने के समाचार भी मिले हैं ।पश्चिमी मीडिया इसे एक आतंकी गुट के रूप में प्रस्तुत कर रहा है।आइए डालते हैं यमन और हाउथी विद्रोह पर एक दृष्टि।

इतिहास- यमन का इतिहास करीब 3000 साल पुराना है।इस्लाम के उद्भव के बाद यमन इस्लामिक प्रभाव में आ गया।हजरत मुहम्मद के बाद एक के बाद एक चार खलीफाओं ने अपने विचारों से इस्लामिक दुनिया को नियंत्रित किया। करबला की लड़ाई के बाद इस्लामिक दुनिया सुन्नी और शिया समुदाय में विभाजित हो गई।अन्य शिया की तरह जैदी भी मानते हैं कि हजरत मुहम्मद के असली वारिस उनके दामाद अली ही थे। जिन्हें मुस्लिम समाज को एक इमाम के रूप में आगे ले जाने का सबसे ज्यादा अधिकार था।यमन के दक्षिण क्षेत्र में सुन्नियों की बहुलता है और उत्तर में शिया समुदाय की बहुलता है। यमन में शिया समुदाय की आबादी करीब 35 फीसदी है।पूरे विश्व में 70 करोड़ शिया में से 8 प्रतिशत जैदी शिया हैं।यमन मूल रूप से पहाड़ी क्षेत्र है।प्रमुख बंदरगाह एडेन है।यमन का पुराना नाम ” अरेबिया फेलिक्स ” ( खुशहाल अरब) था।बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में यह अटोमन तुर्क शासन के तहत रहा। 1839 से 1967 तक दक्षिण यमन ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा था।नवंबर 1967 में जनता के प्रबल प्रतिरोध के चलते ब्रिटेन को यमन छोड़ कर जाना पड़ा।प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद 1918 में पश्चिम एशिया/ मध्य पूर्व में एक तो ऑटोमन साम्राज्य से मुक्त फिलिस्तीन पर ब्रिटिश साम्राज्य के अधिकार को लीग ऑफ नेशंस ने स्वीकार कर लिया तो दूसरी ओर उत्तरी यमन,ऑटोमन साम्राज्य से मुक्त हो गया।ऑटोमन साम्राज्य से मुक्त होने के बाद 1918 से 1962 तक यमन में हमिद्दीन परिवार का शासन था।1962 में यमन का उत्तरी क्षेत्र ,यमन अरब गणराज्य के नाम से जाना जाने लगा और दक्षिण यमन ,ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन रहा । एडेन दक्षिण यमन की राजधानी और आर्थिक केंद्र के रूप में काम करता रहा।साठ के दशक में यमन कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में यमन में एकीकृत लोकतांत्रिक यमन बनाने का आंदोलन शुरू हुआ ।दक्षिण यमन में ब्रिटिश और अमरीकी साम्राज्यवाद का नियंत्रण ,द्वितीय विश्व युद्ध के बाद भी था।नब्बे के दशक की शुरुआत में सोवियत संघ के ढहने तक यमन ,सोवियत प्रभाव में रहा।

अरब राष्ट्रवाद का उदय-

द्वितीय विश्व युद्ध के पहले से ही अरब देशों में साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन की लहरें पैदा हो गई थीं। रूस की अक्टूबर क्रांति के बाद 1919 में तीसरे कम्युनिस्ट अंतरराष्ट्रीय ( थर्ड कम्युनिस्ट इंटरनेशनल ) के गठन के समय लेनिन ने मार्क्स के समय का नारा दुनिया के मजदूरों एक हो को व्यापक रूप देकर” दुनिया के मजदूरों और उत्पीड़ितों एक हो” कहा।साथ ही विकसित पूंजीवादी देशों की क्रांतियां और पूर्व के देशों( एशिया,अफ्रीका,दक्षिण अमरीका के उपनिवेशिक/ अर्ध उपनिवेशिक देश) की क्रांतियां दोनों को एक दूसरी की परिपुरक निरूपित किया।उसके बाद से तीसरे अंतरराष्ट्रीय के सम्मेलनों में पश्चिम एशिया और अफ्रीका के देशों की भागीदारी बढ़ गई। तीस के दशक में लीबिया में इतालवी साम्राज्यवाद के खिलाफ महान देशभक्तिपूर्ण युद्ध में शहीद उमर मुख्तार( जिन्हें मरुस्थल का शेर कहा जाता था) के नेतृत्व में जनता ने भीषण जंग छेड़ी।इस जन युद्ध में इतालवी जनरल ग्रोजियानी को कई बार मुंह की खानी पड़ी।द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अरब देशों में साम्राज्यवाद विरोधी राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष के साथ साथ मेहनतकशों के वर्गीय आंदोलन भी बढ़ने लगे।इसी के समानांतर मुस्लिम ब्रदरहुड आंदोलन जो कि महा इस्लामवादी ( Pan Islamic) तेवर लिए हुए था कुछ जगहों पर आगे बढ़ा।जैसे की मिस्र,यमन,सीरिया,जॉर्डन,फिलिस्तीन आदि में।अरब देशों में कम्युनिस्ट आंदोलन के आगे बढ़ने के साथ ही इराक( सद्दाम हुसैन),जॉर्डन, सीरिया( बशर) जैसे देशों में बाथ सोशलिस्ट पार्टी का भी प्रभाव बढ़ा।इधर प्रथम विश्व युद्ध के अंत में1917 में ब्रिटिश विदेश मंत्री बेलफोर ने फिलिस्तीन पर यहूदियों के अधिकार स्थापित करने के लिए एक घोषणापत्र जारी किया जिसे” बेलफौर डिक्लेरेशन” कहते हैं।कालांतर में ब्रिटिश और अमरीकी साम्राज्यवाद ने1948 में अपनी सोची समझी चाल के तहत संयुक्त राष्ट्र संघ के जरिए फिलिस्तीन अरबों को उनकी जमीन से बेरहमी से बेदखल कर यहुदीवादी ( ज्योनिस्ट) इजरायल की स्थापना की।असल में फासिस्ट हिटलर के अत्याचारों से सताए हुए यहूदियों को यूरोप में शरण देना था।लेकिन उसकी जगह यहूदियों के पवित्र स्थल/ घर यरुशलम ( यरुशलम ,ईसाइयों और मुसलमानों का भी पवित्र स्थल है) को केंद्र कर फिलिस्तीन राष्ट्र बनाने की जगह इजरायल की स्थापना, अरब देशों में हिलोरें मार रहे साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन को कुचलने के लिए एक खूंखार हत्यारा चौकीदार बनाना ब्रिटिश और अमरीकी साम्राज्यवाद का उद्देश्य था।यूरोप के कई देशों में यहूदियों के प्रति कुछ सकारात्मक नजरिया नहीं था।पंद्रहवी शताब्दी में भी हम ये पाते हैं कि ईसाइयों का रुख यहूदियों के प्रति बहुत प्रताड़ित करने वाला था।रोमन कैथोलिक ईसाई धर्म सुधार आंदोलन के समय जर्मनी में मार्टिन लूथर किंग सीनियर( ईसाइयों के प्रोटेस्टेंट समुदाय के संस्थापक) का रुख यहूदियों के प्रति बहुत नकारात्मक था।अमरीका में हालांकि अति अमीर यहूदियों की लॉबी बहुत मजबूत है लेकिन अमरीका और यूरोप में यहूदियों को अपने होमलैंड स्थापित करने की अनुमति साम्राज्यवादियों ने नहीं दी।यहूदियों के साथ मानवीय व्यवहार करने वाले अरब मुस्लिमों का बेरहमी से सफाया कर पश्चिमी साम्राज्यवाद ने यहूदियों के होमलैंड की स्थापना फिलिस्तीन की सर जमीन पर किया।
अरब देशों में कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट आंदोलन का प्रभाव बढ़ने से सऊदी अरब,संयुक्त अरब अमीरात, जैसे देशों के घोर अलोकतांत्रिक तानाशाही वाले राजतंत्र खतरे में पड़ गए।इन देशों ने विशेषकर सऊदी अरब जैसे देश, अमरीकी साम्राज्यवाद की सरपरस्ती में अरब लीग और ओपेक ( पेट्रोलियम उत्पादक देशों का संगठन) के माध्यम से इसराइल के खिलाफ जुबानी रोष जताते रहे लेकिन इनका मुख्य कार्य रहा कम्युनिस्ट और लोकतांत्रिक आंदोलनों का निरंकुश दमन करना।सऊदी अरब में चूंकि मक्का और मदीना जैसे इस्लाम के सर्वोच्च धार्मिक तीर्थ स्थित हैं,वो सदा खुद को मुस्लिम विश्व का स्वघोषित नेता के रूप में प्रस्तुत करता है और कट्टर सुन्नी धार्मिक वहाबी सोच को भारत समेत अन्य देशों में निर्यात करता है ।
तीसरे अंतरराष्ट्रीय के 1935 में आयोजित महाधिवेशन जिसमें हिटलर, मुसोलिनी और तोजो ( जापान) के फासीवाद के खिलाफ संयुक्त मोर्चे की लाइन को कमिंटर्न( तीसरे अंतरराष्ट्रीय) के अध्यक्ष कॉमरेड जॉर्जी दिमित्रोव ने पेश किया था में फिलिस्तीन कम्युनिस्ट पार्टी ( अरब) के प्रतिनिधियों ने भाग लिया था।इजरायल की स्थापना के बाद भी कॉमरेड जॉर्ज हबश के नेतृत्व में फिलिस्तीन की कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा एक स्वतंत्र फिलिस्तीन जिसमें अरब मुस्लिम,अरब ईसाई और यहूदी हिलमिलकर रहेंगे की मांग की गई। इजरायल की स्थापना के वर्ष 1948 में फिलीस्तीनी इलाके ढेर यासीन में मेनाशेम बेगिन के नेतृत्व में इसराइली आतंकी बल ने फिलिस्तीनियों का बड़े पैमाने पर कत्ल ए आम किया जिससे सारे अरब दुनिया में भीषण रोष व्याप्त हो गया।इसराइली आतंकी संगठन के प्रमुख मेनाशेम बेगिन बाद में इजरायल के राष्ट्रपति बने।इजरायल के आतंकी संगठन का स्वरूप बाद में सीआईए के मार्गदर्शन में दुनिया की सबसे बेरहम जासूसी संस्था मोसाद का हो गया।जिसका की अब भारतीय गुप्तचर एजेंसियों के साथ गठबंधन बना है।इजरायल में एक खास बात है कि द्वितीय विश्व युद्ध के पहले और बाद में इजरायल के आतंकी संगठन के जो भी प्रमुख रहे हैं वे इजरायल राष्ट्र की सत्ता में प्रमुख बने रहे।
मिस्र के राष्ट्रपति , पचास व साठ के दशक में अरब राष्ट्रवाद के प्रवक्ता और गुट निरपेक्ष आंदोलन के नेता जमाल अब्दुल नासिर ने स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया जिस पर ब्रिटिश साम्राज्य का कब्जा था।इस मुद्दे को लेकर ब्रिटेन और मिस्र के बीच युद्ध छिड़ गया।मिस्र अपने रुख पर डटा रहा।
इसी बीच 1948,1967 और 1973 में अरब- इजरायल के बीच तीन युद्ध हुए। जिसमें पहले दो जंग में अमरीकी मदद से सराबोर इजरायल के हाथों अरबों की करारी हार हुई।
1964 में फिलिस्तीन के वामपंथी संगठनों ने मिलकर फिलिस्तीन मुक्ति संगठन ( पीएलओ) बनाया।इसके प्रमुख बने अल फतह संगठन के यासर अराफात।1993 में ओस्लो शांति समझौते को स्वीकार करके अमरीका की सरपरस्ती में इजरायल के साथ समझौता करने के बाद पी एल ओ और यासर अराफात की लोकप्रियता फिलिस्तीन की जनता में बहुत घट गई। समझौते के अनुसार इसराइली संप्रभुता,उसके अस्तित्व को स्वीकार कर शांतिपूर्ण सह अस्तित्व के आधार पर चारों ओर से इजरायल से घिरे छोटे से इलाके गाज़ा और वेस्ट बैंक में फिलिस्तीन सरकार की स्थापना को मान लिया गया।लेकिन इजरायल ने हमेशा की तरह फिलिस्तीन की जनता पर क्रूर जुल्म करना जारी रखा और फिलिस्तीन इलाकों में यहूदी बस्तियों को बलपूर्वक बसाते रहा।इसके फलस्वरूप 1987 में पहले इंतिफादा ( इजरायल के खिलाफ फिलिस्तीनियों का अहिंसक प्रतिरोध) के समय हमास का उदय हुआ जिसे फिलीस्तीनी युवाओं का अच्छा समर्थन मिला।हमास का जन्म मुस्लिम ब्रदरहुड आंदोलन से हुआ ।हमास ने 2006 में गाज़ा में हुए चुनाव में पीएलओ को पराजित कर सरकार बनाई थी।गाज़ा के चुनाव में हारने के बाद पी एल ओ की सरकार केवल वेस्ट बैंक में सिमट कर रह गई।भले ही अमरीका और इजरायल,हमास को आतंकवादी घोषित करता रहे लेकिन हमास ने अपने राजनैतिक कार्यक्रम में अरबी मुस्लिम,अरबी ईसाइयों के साथ साथ यहूदियों को लेकर,साम्राज्यवादियों के हस्तक्षेप से मुक्त आज़ाद फिलिस्तीन का लक्ष्य रखा है।वर्तमान में इसराइल के खिलाफ गाज़ा समेत अन्य फिलिस्तिनी इलाकों में जो सशस्त्र संघर्ष चल रहा है उसमें हमास और वामपंथी संगठन डीपीएलफ का मोर्चा बना हुआ है।डीपीएलएफ के नेतृत्व में सत्तर के दशक की पीएलओ के सशस्त्र संघर्ष की किंवदंती बन चुकी कॉमरेड लैला खालिद हैं ।लैला खालिद,यासर अराफात की एक समय की घनिष्ठ सहयोद्धा थीं।डीपीएलएफ की स्थापना हुए 55 वर्ष बीत चुके हैं।

नब्बे के दशक की शुरुआत में सोवियत संघ के ढहने के बाद –
हाउथी,यमन के सादा प्रांत में रहने वाले एक बड़े समुदाय हैं।ये शिया समुदाय के बड़े गोत्र जैदी से संबंधित हैं। जैदीयों की आबादी यमन में करीब 35 प्रतिशत है।यमन पर करीब 1000 साल तक जैदी इमामों का शासन रहा। 1962 में हुए तख्ता पलट से इस व्यवस्था में बदलाव आया।तब से यमन में जैदी सत्ता में प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं।1993 से 1997 तक यमन में सांसद रहे प्रभाव शाली जैदी धर्माचार्य हुसैन अब्दुरेद्दीन अल होउथी, यमन के राष्ट्रपति अली अब्दुल्लाह सालेह के प्रखर आलोचक थे। वे सालेह सरकार के अमरीका और इजरायल परस्त नीतियों को बदलने के लिए आवाज उठा रहे थे। शिया जिनका नेतृत्व हुसैन अल होउथी कर रहे थे,राष्ट्रपति की तानाशाही का विरोध करने के कारण यमन की सरकार ने इनके संगठन के अनुदान में कटौती कर दी।जैदी समुदाय ने इसके खिलाफ सरकार विरोधी प्रदर्शन शुरू किया। सरकार ने अल होउथी की गिरफ्तारी के लिए वारंट जारी किया।तब सरकारी बलों के साथ अल होउथी समर्थकों का हिंसक संघर्ष शुरू हो गया।सन 2004 में सुरक्षा बलों ने अल होउथी को मार डाला।उसके बाद से उनके समर्थकों ने सरकार के खिलाफ छह विद्रोह किए जिन्हें होउथी वार कहा जाता है। 2010 में सरकारी सेना और होउथी विद्रोहियों के बीच युद्धविराम हुआ।ठीक उसके एक साल बाद पूरे अरब में ट्यूनीशिया से लेकर मिस्र तक अरब वसंत विद्रोह की गूंज सुनाई दी जिसमें यमन के राष्ट्रपति अबू सालेह के खिलाफ भी जन रोष उमड़ पड़ा।इसी दौरान होउथी विद्रोहियों ने उत्तर यमन सहित कई क्षेत्रों में अपनी स्थिति ताकतवर बना ली।सितंबर 2014 में होउथी ने राजधानी साना पर कब्जा कर लिया। उन्होंने शुरू में संयुक्त राष्ट्र संघ के शांति वार्ता को माना मगर बाद में उन्होंने राष्ट्रपति मंजूर अल हादी को हटा दिया।अपदस्थ राष्ट्रपति हादी के अनुरोध पर सऊदी अरब सहित 9 सुन्नी देशों ने होउथी विद्रोहियों पर ” ऑपरेशन डिसाइसिव स्टॉर्म” के नाम पर हवाई हमले शुरू किए।मगर न तो होउथी राजधानी साना से हटे और न ही हादी सत्ता में वापस लौटे।मार्च 2017 में 7 शांति समझौते असफल साबित हुए।दिसंबर 2017 में सऊदी अरब द्वारा 30 माह तक चलने वाले हमले के बावजूद होउथी ने उत्तरी यमन में अपना नियंत्रण बनाए रखा।इसके बाद 2018 में स्टॉकहोम,2019 और 2022 में शांति समझौते हुए मगर वो टिके नहीं।जून 10,2021 को ट्रंप प्रशासन ने होउथी को विदेशी आतंकी संगठन कहा और अमरीकी सरकार के द्वारा चिन्हित खास वैश्विक आतंकी संगठन की सूची के एक सदस्य के रूप में घोषणा की।साथ ही उनका समर्थन देने के लिए ईरान को आतंकवाद समर्थक देश कहा।हालांकि बिडेन प्रशासन ने सत्तासीन होने के एक माह बाद इस सूची को वापस ले लिया।मगर मालिकी सहित होउथी के तीन नेताओं पर प्रतिबंध लगाये रखा।

दक्षिण के सुन्नी समुदाय के संगठनों को सऊदी अरब मदद कर रहा था।सऊदी अरब,अमरीकी और ब्रिटिश ताकतें ,शुरू से ही यमन में अस्थिरता पैदा करने में लगे रहे।सऊदी अरब,यमन की सुन्नी सरकार और सुन्नी संगठनों को तमाम अंतर्राष्ट्रीय कानून को ताक मे रखकर भरपूर मदद और इस्तेमाल करता है।शिया संगठनों को ईरान और हेजबुल्लाह( लेबनान का शिया लड़ाकू संगठन )का समर्थन प्राप्त होता रहा।इनके अनुसार वे हाउथी को नैतिक और आध्यात्मिक समर्थन देते हैं।सामरिक मदद और प्रशिक्षण देने के बारे में ईरान और हेजबुल्लाह ने हमेशा इंकार किया है और इसे अमरीका,इजरायल,ब्रिटेन और पश्चिमी मीडिया का झूठा प्रचार कहा है। जुलाई 2018 में सऊदी अरब के लगातार हमलों से तंग आकर होउथी ने लाल सागर में सऊदी अरब के तेल टैंकर को नुकसान पहुंचाया। उस समय संयुक्त राष्ट्र संघ ने युद्धरत यमन के संकट को ” विश्व का सबसे बड़ा मानवीय संकट निरूपित किया” ।यमन के दो करोड़ तीस लाख जनता( जो कि आबादी का अस्सी प्रतिशत है) के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ ने मानवीय मदद और सुरक्षा की जरूरत को उठाया लेकिन पश्चिमी साम्राज्यवाद,सऊदी अरब ,संयुक्त अरब अमीरात और इजरायल ने इसे कभी स्वीकार नहीं किया।सऊदी अरब से चल रहे जंग के दौरान 14 सितंबर 2019 को होउथी ने सऊदी के दो बड़े तेल रिफाइनरी पर ड्रोन से हमला किया। उस समय भी अमरीका ने ईरान को इस घटना के लिए जिम्मेदार ठहराया लेकिन ईरान ने खंडन किया।2022 की शुरुआत में होउथी ने संयुक्त अरब अमीरात ( यूएई) पर ड्रोन और बैलेस्टिक मिसाइल से हमला किया।जवाब में अल दहफ्रा वायु सेना अड्डे से 2000 अमरीकी सेना ने होउथी के खिलाफ पैट्रियोट मिसाइल से हमला किया।
हाउथी क्या चाहते हैं –
हाउथी साफ जाहिर करते हैं कि उनका प्रमुख उद्देश्य अमरीका और इजरायल का नाश ,यहुदीवाद( ज्योनवाद) के प्रभुत्व का खात्मा और जैदी इनामशाही की पुनर्स्थापना की कोशिश करना।उन्होंने से राष्ट्रवादी और लोकप्रिय भाषा अख्तियार करना शुरू किया है और अपने मोर्चे में सुन्नी समुदाय से गठबंधन सहायक की तलाश कर रहे हैं ताकि उन्हें केवल जैदी आंदोलन के कट्टर अनुयाई न माना जाए। उन्होंने 2013 से 2014 के बीच संयुक्त राष्ट्र विशेष संवाद सम्मेलन में भी भाग लिया है।गत 7 फरवरी को यमन के होउथी समूह के नेता अब्दुल मलिक अल होउथी ने गाज़ा में इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों के सफाया अभियान जारी रखने पर लाल सागर और एडेन की खाड़ी में हमले बढ़ाने की कसम खाई। अल होउथी ने अपने समूह द्वारा प्रसारित टीवी चैनल अल मसीरा में कहा, मैं उन्हें ( अमरीका,ब्रिटेन और इजरायल) चेतावनी देता हूं कि उन्हें गाज़ा के खिलाफ अपनी आक्रामकता रोकनी चाहिए और अपनी घेराबंदी रोकनी चाहिए अन्यथा हम अधिक से अधिक हमलों को बढ़ाने की कोशिश करेंगे।उन्होंने यह भाषण अपने बड़े भाई सशस्त्र समूह के संस्थापक हुसैन बैड्रेडिन अल होउथी की हत्या की 20 वीं वर्षगांठ मनाने के अवसर पर दिया था,जो 2004 में उत्तरी सादा प्रांत के होउथी गढ़ में यमनी सरकारी सेना के साथ संघर्ष के दौरान मारे गए थे।
हाउथी सेना के प्रवक्ता अल अलसरी ने कहा है कि उन्होंने लाल सागर से गुजरने वाले अमरीकी जहाज स्टार अरियास को निशाना बनाया है। होउथी सेना के प्रवक्ता ने कहा है कि उन्हें यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि वे फिलिस्तीन के साथ मरते दम तक खड़े रहेंगे।जब तक इजरायल ,गाज़ा समेत पूरे फिलिस्तीन पर आक्रमण बंद नहीं करता तब तक लाल सागर से गुजरने वाले इजरायल जहाज और इजरायल की ओर जाने वाले/ उन्हें मदद पहुंचाने वाले जहाजों को वे निशाना बनाते रहेंगे।

हाउथी,हमास,हेजबुल्लह का अन्य लड़ाकू संगठनों से फर्क-
अमरीकी साम्राज्यवाद द्वारा अस्सी के दशक में अपने भू राजनैतिक हित में और साम्यवाद का विरोध करने के नाम पर पश्चिम एशिया और अफ्रीका में पैदा किए गए आतंकवादी संगठन तालिबान, अल कायदा या इस्लामिक स्टेट्स( आइसिस) से साफ तौर पर हमास,हेजबुल्लाह या होउथी का फर्क है।ये संगठन सशस्त्र संघर्ष में जरूर यकीन करते हैं और इस्लाम के आदर्शों से प्रेरणा ग्रहण करते हैं मगर ये खुलकर पश्चिमी साम्राज्यवाद और इजरायल का विरोध करते हैं और आज़ाद फिलिस्तीन के पक्ष में मजबूती से खड़े हैं।इनकी तुलना में चाहे तालिबान हो या अल कायदा हो या आइसिस हो इनका जन्म पेंटागन ( अमरीकी रक्षा मंत्रालय) में हुआ है और अमरीकी डॉलरऔर सऊदी अरब के पेट्रो डॉलर के बल पर ये कट्टर धर्मांध आतंकी कारवाई के जरिए प्रगतिशील ताकतों का सफाया करते हैं( जैसे इराक,सीरिया और तुर्की में कुर्द कम्युनिस्ट छापामारों और मुक्तिकामी महिलाओं का दमन,जो कि अमरीका और तुर्की के फासिस्ट शासक एरडोगन का लक्ष्य है) और जन संघर्षों को भटका कर साम्राज्यवाद के हित में अपने प्रतिक्रियावादी रूढ़िवादी उद्देश्यों को पूरा करने में लगे रहते हैं।ये पूरी तरह प्रगतिशील व्यवस्था और प्रगतिशील सोच के सख्त खिलाफ हैं।असल में कई वामपंथी प्रगतिशील बुद्धिजीवी ये देखते हैं कि साम्राज्यवाद विरोधी या इसराइल विरोधी संग्राम में कोई वामपंथी संगठन नेतृत्व में हैं या नहीं।यदि नहीं तो ये पश्चिमी साम्राज्यवादी मीडिया के प्रचार में बहकर हमास,हेजबुल्लाह या होउथी को भी इसराइल के साथ आतंकी कहने लगते हैं।ऐसा करते वक्त वो दुष्ट युद्ध अपराधी इसराइल और साम्राज्यवादी ताकतों का सरगना अमरीका द्वारा किए गए तमाम मानवता विरोधी अपराधों को लघु बना देते हैं और ये भूल जाते हैं कि वो इजरायल ही है जो पिछले 75 सालों से फिलिस्तीन को रौंद रहा है।भीषण अत्याचारों को सहते हुए फिलिस्तीन सहित पूरे पश्चिम एशिया में जो संगठन अमरीका, नाटो या इसराइल की दानवीय ताकतों से ,अन्याय के खिलाफ मुक्तिकामी जनता का और न्याय का पक्ष ले लड़ रहे हैं उन्हें किस बिना पर आतंकी कहा जा सकता है? और एक बात ,जब सशक्त और राजनैतिक रूप से परिपक्व कम्युनिस्ट या वामपंथी आंदोलन का अभाव हो तो जनता अन्याय के खिलाफ क्या लड़ाई लड़ने के लिए ऐसे संगठनों के बनने का/ उभरने का इंतजार करे या जब समस्या सर पे हो तो उपलब्ध संसाधन या संगठनों जो उनके मुद्दों को लेकर लड़ रहे हैं के साथ एकजुट हों?

( लेखक क्रांतिकारी सांस्कृतिक मंच (कसम) के महासचिव हैं)

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