Editorial: छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस की खामोशी का क्या मायने !

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छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस में इन दिनों माहोल नहीं है । जबकि अभी लोकसभा चुनाव में बीजेपी को उसे टक्कर देना है । कांग्रेस आला कमान के पास अभी ऐसे नाम नहीं है जो संघर्ष करके कांग्रेस का खाता बचा सके । ऐसा प्रतीत होता है कांग्रेस विधान सभा चुनाव में पराजित होने के बाद अपनी ऊर्जा को सुप्त कर रखी है । उनके कोई भी नेता अब जुझारू तौर पर जनता के सामने नहीं उभर रहा है जबकि पूरे ग्यारह सीटों पर चुनौती का सामना करना है । यहां तक कि पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के भी कोई बड़ा बयान नहीं आ रहा है । न ही टी एस सिंहदेव कुछ बोल रहें हैं यहां तक कि विधान सभा अध्यक्ष रहे चरणदास महंत भी मौन साधे हुए हैं । यह बात अलग है की विधान सभा सत्र के दौरान उनकी शेरो शायरी चल गई और कुछ कुछ उमेश पटेल भी आवाज उठा कर कांग्रेस की उपस्थिति का अहसास करा दिया अन्यथा कांग्रेस की शून्यता ही लोग देख रहे थे । शायद यही कारण है इसका असर लोकसभा चुनाव में भी देखने मिल रहा है । कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ के ग्यारह सीटों के लिए अब तक नाम का एलान नहीं कर पाई है । जबकि बीजेपी ने तीन दिन पहले यह काम अंजाम कर चुकी है । यानी सीधे शब्दों में कहें तो कांग्रेस नाम एलान के मामले में पिछड़ गई है । ऐसी ही स्थिती कांग्रेस ने विधान सभा चुनाव में पैदा की थी । पितृपक्ष टोटका के नाम से बहुत बाद में कांग्रेस ने नाम की घोषणा की जिस वजह से प्रत्याशियों को फिल्ड में काम करने का पर्याप्त समय नहीं मिला और अंत में इसका परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस को पराजय का मुख देखना पड़ा । अब कांग्रेस यह दावा कर रही है कि वह पूरी ग्यारह सीटें जीतेगी। कांग्रेस अध्यक्ष स्वयं विधान सभा चुनाव हार गए हैं उसके बाद यदि उनको कांग्रेस की लोकसभा सीटों पर भरोसा है तो ज्यादा ओवरकॉन्फिडेंस में न रहते हुए नामों का एलान करे तभी भला हो सकता है । दूध के जले को छाछ को भी फूक फूक कर पीना चाहिए । कांग्रेस आला कमान भी इस मामले में गंभीर नजर नहीं आ रहा है । खुद राहुल गांधी का ध्यान अपनी पद यात्रा में पहचान बना लेने में लगा हुआ है और उधर कांग्रेस के उनके कई दिग्गज नेता चिड़ियों की तरह उड़ते जा रहें हैं । चुनाव में उनकी इस यात्रा का कितना लाभ मिलेगा यह समय बताएगा लेकिन अनुभव बताता है कि उनकी पिछली यात्रा से कांग्रेस को कोई लाभ नहीं मिला अलबत्ता वह तीन राज्यों में चुनाव हार गई ।इसलिए बेहतर होता यदि इस वक्त कांग्रेस आत्मचिंतन करती और अपने संगठन को मजबूत करने में समय लगाती । अगर राहुल गांधी को ही पीएम बनाना एक मात्र उद्देश्य है तो कांग्रेस को अभी लम्बी यात्रा करनी पड़ेगी । लोकसभा चुनाव में इन सबसे परे पहले साफ सुथरे बेदाग प्रत्याशी को जल्दी सामने लाए तभी जनता का विश्वास जीता जा सकेगा । अन्यथा कांग्रेस को फिर बुरे दिन देखने पड़ेंगे । बयानबाजी से कुछ नहीं होता इस वक्त फिल्ड में काम करने की जरुरत है ।प्रदेश कांग्रेस इस बात को अच्छी तरह से समझ ले तो उसकी सेहत सुधर जायेगी ।अभी तो लोकसभा चुनाव सिर पर है और ऐसे में यदि कांग्रेस अपनी खामोशी नहीं तोड़ेगी तो उसे लोकसभा में बीजेपी से मिली चुनौती का सामना करना मुश्किल हो जायेगा ।

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