Tuesday, June 22nd, 2021

International Labour Day 2021 बेबस हाथों में अब पत्थर तोड़ने की चुनौती, अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस विशेष

Raipur, News Hustle India, (अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस – International Labour Day)

लेबर डे : यह शानदार दूसरा दुखद साल है जब श्रमिक दिवस 2021 के दिन मजदूर (Labour) अपने अपने घरों में कैद हैं। यानी कोरोना महामारी को लेकर लॉकडाउन लगा हुआ है । कोरोना वैश्विक महामारी ने यदि सबसे बड़ा नुक्सान किसी का किया है तो वह मजदूरों (Labour) का किया है। आज उसके लाचार बेबस हाथों में पत्थर तोड़ने की जवाबदारी आ पड़ी है। कोरोना ने सब कुछ निगल लिया है लेकिन वह मजदूरों की शक्ति नहीं निकल सकता। कितने भी हाथ बेबस हो वह पत्थर तोड़कर महल बनाने में कामयाब हो जायेगा। सवाल सिर्फ इच्छाशक्ति की है। कोरोना से यह युद्ध जितना है तो दुनिया के तमाम अमीरजादों को यह समझ लेना चाहिए की वह बिना मजदूरों के दुनिया की कोई लड़ाई नहीं जीत सकता। सदियों का इतिहास गवाह है जिस देश में श्रमिक के हाथ कभी थकते नहीं है वह देश हमेशा तरक्की की राह पर चलता है। अभी आप सर्वे कर लीजिये कोरोना मजदूरों को कम और बड़े लोगों को ज्यादा हुआ है । जो दिन रात मेहनत करते हैं , जो कड़ी धूप में दिनभर महल खड़ा करते हैं , जो किसान तीखी तेज धूप में खेतों में हल चलाते हैं , जो पानी बरसात में भी खेतों में काम करने से नहीं डरते हैं , जो ठण्ड और ओलों से नहीं डरते उनको कभी ऐसी महामारी छू नहीं सकत। वो कभी भी कोरोना से नहीं डर सकते ।

और न ही कोरोना उसके पास तक फटक सकता है। मजदूरों और किसानों के पास पहले से ही इतनी प्रतिरोधक क्षमता है की वे हर परिस्थिति का मुकाबला करने में सक्षम हैं। यदि सच कहा जाये तो उनको यह कृत्रिम इम्युनिटी की जरूरत ही नहीं है। यह उनके लिए बेमानी साबित होगी। देश की सारी बिमारियों और महामारियों का जड़ है आलस और सुविधापरस्ती । जिनको बात बात में नौकर की जरूरत है ,जो कोई दूसरा बनाकर दे तब खाये , दूसरा कपड़ा धोकर लाये तब पहने , दूसरा घर की सफाई करे तब अंगना साफ हो ऐसी दुनिया में ऐसी बीमारियां घुसती है क्योकि सुविधाओं ने उनको सुविधाभोगी बना दिया है। उनके पास प्रतिरोधक क्षमता नहीं है। सुविधाभोगी लोग ही बीमारियों को लेकर आते हैं। आपने देखा होगा कोरोना हवाई जहाज में बैठकर सभी देशों से आया है। श्रमिक उसे सायकल में नहीं लेकर आये । पहले सरकार हवाई अड्डे को बेन करी है फिर ट्रैन और बस को। लेकिन अगर कोरोना से आज कोई सफर कर रहा है तो वह मजदूर है। मोदीजी ने अचानक लॉकडाउन लगाया तो करोड़ो मजदूर (Labour) के ऊपर पहाड़ टूट पड़ा।

लाखों प्रवासी मजदूर (लेबर) को जत्थे के जत्थे हजार किलोमीटर पैदल चलकर अपने घर लौटना पड़ा। सारे कल कारखाने बंद हो गए। उत्पादन रुक गया। मालिकों ने बिना काम मजदूरों को वेतन या सहायता करने से इंकार कर दिया। लाखों लोगों की रोजी रोटी चली गई। आज तक वे नौकरी में नहीं लौट पाए। लाखों लोग बेरोजगार हो गए। उनका पूरा परिवार भूख की जिंदगी जी रहा है। यह आपदा तो कोरोना से बड़ा है । कोरोना तो एक ही आदमी को ले जाता लेकिन भूख की पीड़ा पूरे परिवार को निगल जाता है। वह त्रासदी बीते ज्यादा दिन नहीं हुए है सिर्फ एक साल हुी हुआ है कि कोरोना की दूसरी लहर खतरनाक बनकर तांडव दिखा रही है। इस लहर के सामने सब बेबस हैं यहां तक की न्यायपालिका भी अब बेबस लाचार नजर आ रही है। लोगों को ऑक्सीजन नहीं मिल रहा है , लोगों को बेड नहों मिल रहा है , लोगों को रेमडेसिविर इंजेक्शन नहीं मिल रहा है , लोगों को दाना पानी नहीं मिल रहा है और कोर्ट बार बार सरकार को कह रही है इनको ऑक्सीजन दी , इनको, रेमडेसिविर दो, इनको बेड दो पर सरकार के पास अभी कुछ नहीं है। बाहर से विदेशों से सहायता आते जाएगी , ऑक्सीजन के प्लांट लगाएंगे तब दे पाएंगे। अब न्यायपालिका क्या करेगी। यह लाचारी पूरी दिख रही है। लेकिन मजदूर कभी लाचार नहीं होगा। उसके पास दोनों हाथों की ताकत है वह अपने बेबस हाथों से भी महल बनाने की ताकत रखता है। उसे बेबस हाथों से भी पत्थर तोड़ने की चुनौती स्वीकार है। मजदूर (लेबर) हमेशा जिंदाबाद रहा है और अनंतकाल तक जिंदाबाद रहेगा।

 

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