Friday, June 25th, 2021

राजिम से हरिद्वार तक गंगा स्नान के पुण्य के मायने ,

रायपुर,19 अप्रेल , न्यूज हसल इण्डिया ,हरिद्वार कुम्भ में गंगा स्नान से जो पुण्य कमाने के लिए कवायद की गई वहआज एक खतरनाक वायरस का सहयोगी बनकर लोगों के जीवन से खिलवाड़ करने मेंसहायक बन गया है। आज राज्यों में ऐसी स्थिति निर्मित हो गई है की कुम्भ से लौटने वालों की पूजा करने के बजाय उनको क्वारंटाइन करना पड़ रहा है। जो साधु संत भगवान के रूप में लोगों के दिलों में श्रद्धा के पात्र थे वे अब उनको किसी रुग्ण देह की तरह दूर रखना पड़ रहा है। साधु संत कुम्भ को लेकर आपस में हो लड़ पड़े और उनको बीच में ही कुम्भ छोड़ना पड़ा ,और छोड़ना क्या पड़ा समापन का एलान करना पड़ा । जब हजारों लाखों जिंदगी को कोरोना निगल गई तब जाकर सरकार व् साधु संतों की आँख खुली और अब कुम्भ से दूरियां बना रहें है। प्रधान मंत्री अब साधु संतों से बात कर रहें हैं और अपील कर रहें हैं कुम्भ को प्रतीकात्मक किया जाये। आखिर यह प्रतीकात्मक होता क्या है ? कुम्भ तो कुम्भ ही होता है । अगर एक साल भगवान को मन से घर पर हाथ जोड़ लिया जाये तो भगवान नाराज नहीं हो जायेंगे। लेकिन कुम्भ पूरे शबाब के साथ जारी रहा। ३३ लाख लोगों ने गंगा स्नान किया। क्या यह कोरोना काल में वाजिब था ? क्या यह विद्वान साधुसंतों और राजनेताओं के समझ के बाहर की बात थी। आखिर नतीजा क्या हुआ लोग बड़ी संख्या में कोरोना से संक्रमित हो गए। आज वो जब घर लौट रहें हैं तो अपनों से दूर रहना पड़ रहा है। उनको गंगा स्नान के पुण्य का क्या फल मिला यही की अपनों से बिछड़ जाएँ। उनके की चिर परिचित और परिजन महामारी के शिकार हो चले। कुछ जिंदगी से बिदा हो गए और कुछ अभी अस्पतालों में सांसों की गिनती कर रहे हैं। आखिर इन बातों पर क्यों ध्यान नहीं दिया गया। यदि समय रहते सरकार नियंत्रित करती तो यह महामारी का फैलाव इतने बड़े रूप में नहीं होता। कुम्भ को करना और नहीं करना यह सरकार और साधुसंतों के बीच का फैसला था। यदि वे सब अपने विचारों में समन्वय बिठाकर विचार कर लेते तो कुम्भ के कोरोना से बचा जा सकता था। सरकार का तर्क था की चार माह के चलने वाले कुम्भ को एक माह किया गया। सवाल चार माह और एक माह का नहीं था। सवाल तो संक्रमण का था। यदि संक्रमण का खतरा है तो एक दिन भी कुम्भ करना यानी लोगों की जिंदगी से खेलना ही है। और यह जमकर हुआ। अब अगर प्रधानमंत्री प्रतीकात्मक कुम्भ की बात करते हैं तो यह भी उचित नहीं है क्योकि प्रतीकात्मक का आखिर गाइडलाइन क्या है। इसलिए कुछ साधु संतों ने तो यह जवाब भी दे दिया की प्रधान मंत्री पहले अपनी चुनावी रैलियां बंद करें। यह बात भी बिलकुल सोलह आने वाजिब है की पांच राज्यों में हो रहे चुनाव में राजनितिक दलों की जमकर रैलियां निकल रही है। वह भी कोरोना गाइडलाइन को ताक में रख कर । और यह काम खुद प्रधानमंत्री की रैलियों में भी चल रहा है । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी , गृहमंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष जे पी नड्डा , मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की बंगाल में रैलियां निकल रही है। जिसे रोज लोग मीडिया में देख रहें हैं और जमकर आलोचना कर रहें हैं। अब ढेर सारी रैलियां , सभा , रैलियां ट्रेक्टर रैलियां करके राहुल गांधी ने एलान किया है कि वे अपना बंगाल का सब दौरा रद्द कर रहें हैं। सच तो यह है कि कांग्रेस बंगाल में मुकाबला करने की स्थिति में ही नहीं है तो रैलियां करके राहुल गांधी करेंगे क्या ? उससे अच्छा है रद्द करके नाम कमा लिया जाये यानि यहां भी राजनितिक लाभ। इन रैलियों को संचालित करने कई राज्यों से कार्यकर्ता गए हैं। छत्तीसगढ़ से तो बड़ी संख्या में असम और बंगाल कार्यकर्ता भेजे गए हैं जिन लोगों की वापसी हो गई है और इसकी जानकारी सरकार के पास भी नहीं है। उनमें से बहुत से संक्रमित है। जो बाहर से संक्रमण लेकर आये हैं। आप समाचारों में देख सुन रहें होंगे कि छत्तीसगढ़ में कोरोना के तांडव की बहुत भयावह स्थिति है। यह सब राज नेताओं के राजनीतिक लाभ के चलते जनता के प्रति मेहरबानी है। उधर गंगा स्नान था तो इधर छत्तीसगढ़ में वर्ल्ड सेफ्टी क्रिकेट टूर्नामेंट चलाया जा रहा था जिसमें रोज पचास हजार लोग स्टेडियम में खेल देखने जुट रहे थे। आधे से ज्यादा दूसरे राज्यों से भी आये हुए थे15 दिनी तक यह खेल चलता रहा। रोज पचास हजार लोग किसी एक जगह यदि पंद्रह दिन इकट्ठा होंगे तो आखिर कब तक संक्रमण से बचा जा सकेगा। आखिर जब खेल ख़त्म हुआ तो पता लगा की संक्रमण बहुत बढ़ गया है। आज छत्तीसगढ़ में पूर्ण लॉकडाउन चल रहा है और संक्रमित राज्यों में शीर्ष स्थानों पर जगह बना लिया गया है। इसी छत्तीसगढ़ में इससे पहले राजिम माघी पुन्नी मेला का आयोजन सांस्कृतिक विरासत को बचाने के नाम से किया गया। फरवरी में माघ पूर्णिमा से महाशिवरात्रि तक मेले का आयोजन हुआ। रोज एक लाख लोग इस मेले में शामिल हो रहे थे पर किसी ने यह नहीं सोचा की यह मेला संक्रमण का कारण भी बन सकता है। मंत्री मस्त उद्घाटन करते रहे , साधु संत शाही स्नान करते रहे और जनता भीड़ बनती रही। आज जिस बुरे दौर से देश गुजर रहा है वह सब इन छोटी छोटी गलतियों की वजह से है। और इसके पीछे उच्च ओहदे पर बैठे हमारे राजनेता और आला अफसर जिम्मेदार हैं। पिछले मार्च से यह कोरोना महामारी हिन्दुस्तान में उपस्थित है तो यह विचारणीय है कि कम से कम वह भीड़ रोकी जाये जो अनावश्यक है। इन आयोजनों में भी कोरोना गाइडलाइन का पूर्णतः पालन नहीं हुआ है केवल औपचारिक तौर पर कहीं कहीं बोर्ड लगा दिए गए की कोरोना गाइडलाइन का पालन कीजिये । पर मंत्री , मुख़्यमंत्री और प्रधानमंत्री के कार्यक्रमों में ही इसका पालन होते नहीं दीखता है फिर लोगों की बात क्या कहें । जो मुख्य मंत्री मास्क न लगाने के लिए हजारों रूपये जुरमाना लगाने की घोषणा करते हैं वही मुख्यमंत्री खुद बिना मास्क लगाए कार्यक्रमों में नजर आते हैं।

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