Sunday, October 17th, 2021

Power Crisis: कोयले पर हाहाकार, अंधेरे में डूबने का डर, समझिए संकट कितना बड़ा है

देश बिजली के बड़े संकट की चपेट में जाता दिख रहा है। राज्यों ने केंद्र सरकार से मदद मांगी है तो पावर सप्लाई करने वाली कंपनियां भी ग्राहकों से सोच समझकर बिजली खर्च करने को कह रही हैं। ऐसे में सवाल है कि आखिर ये स्थिति क्यों बन गई। इसका देश की इकोनॉमी और आप पर क्या-क्या असर पड़ सकता है। आइए सिलसिलेवार समझते हैं।हमारे देश में करीब 72 फीसदी बिजली की मांग कोयले के जरिए पूरी की जाती है। कोयले से बिजली उत्पादन के बाद कंपनियां इंडस्ट्री से लेकर आम लोगों तक को सप्लाई करती हैं। इसके एवज में कंपनियां अपने ग्राहकों से यूनिट के हिसाब से बिजली बिल लेती हैं। देश में कोयले की कमी आ गई है। इस कमी की वजह खपत का बढ़ जाना है। अगस्त 2021 से बिजली की मांग में बढ़ोतरी देखी जा रही है। अगस्त 2021 में बिजली की खपत 124 बिलियन यूनिट (बीयू) थी जबकि अगस्त 2019 में (कोविड अवधि से पहले) खपत 106 बीयू थी। यह लगभग 18-20 प्रतिशत की वृद्धि है।  खपत बढ़ने की कई वजह है। सबसे पहली वजह अनलॉक की प्रक्रिया है। कोरोना की पहली और दूसरी लहर के बाद अब देश की इंडस्ट्रियां लगभग पूरी तरह से काम कर रही हैं। इनका विस्तारिकरण हो रहा है। इसके अलावा सरकार का दावा है कि  ‘सौभाग्य’ कार्यक्रम के तहत 28 मिलियन से अधिक घरों को बिजली से जोड़ा गया था और ये सभी नए उपभोक्ता पंखे, कूलर, टीवी आदि जैसे उपकरण खरीद रहे हैं। इस वजह से भी बिजली की खपत बढ़ी है। गर्मी की वजह से खपत को बूस्ट मिला है।ये संकट अचानक नहीं है। पिछले कई महीनों से हालात ठीक नहीं है। दरअसल, भारत में कोयले की स्टोरेज सीमित अवधि के लिए है। बिजली संयंत्रों में कोयले का औसत स्टॉक 3 अक्टूबर 2021 को लगभग चार दिनों के लिए था। हालांकि, यह एक रोलिंग स्टॉक है, कोयला खदानों से थर्मल पावर प्लांट तक हर दिन रेक के माध्यम से कोयला भेजा जाता है। 

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