Friday, July 23rd, 2021

Rani Laxmi Bai Death Anniversary : खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी, महारानी लक्ष्मी बाई के बलिदान दिवस पर विशेष

Rani Laxmi Bai Death Anniversary

Rani Laxmi Bai Death Anniversary : खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी, महारानी लक्ष्मी बाई की पुण्यतिथि पर विशेष
Rani Laxmi Bai Death Anniversary : खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी, महारानी लक्ष्मी बाई की पुण्यतिथि पर विशेष

Rani Laxmi Bai Death Anniversary : रायपुर,(प्रियंका घाटगे, न्यूज़ हसल इंडिया ), नारी इस धरती पर शक्ति का रूप होती है। नारी एक है पर उसके रूप अनेक होते हैं। स्त्री को ही इस धरती पर मां लक्ष्मी,

सरस्वती और शक्ति का रूप भी माना जाता है। स्त्री के जीवन का सफर बहुत लम्बा होता है। वह जब इस धरती पर जन्म लेती है तो उसे कई किरदार निभाने पड़ते हैं।

पहले वह कन्या के रूप में बेटी बनकर जन्म लेती है फिर वह पत्नी और मां भी बनती है। स्त्री में इतनी शक्ति होती है कि उसने यमराज के सामने भी सावित्री के रूप में भी अपने पति के प्राणों की रक्षा की है। स्त्री का एक ही रूप नहीं होता है कहते है उसके इस धरती पर इतने रूप है कि भगवान को इस उसके इस रूप को समझ नहीं सकते हैं।

स्त्री अगर शांत है तो वह बहुत ही सुन्दर घर को बना देती है पर यदि उसका कही अपमान  हो जाए तो उस घर में देव भी निवास नहीं करते है इसलिए हमारे शास्त्रों में कहा गया है जिस घर में स्त्री का सम्मान ना हो उस घर में देव भी निवास नहीं करते है।

इसलिए इस धरती पर सभी कल्याण तभी सम्भव है जब स्त्री का इस धरती पर सभी लोग सदैव सम्मान करें। आज हम उस स्त्री शक्ति के बारे में बात करने जा रहे है जो महारानी लक्ष्मी बाई बनकर इस धरती पर मराठा जाती में जन्म लेकर पुरे विश्व का गर्व बढ़ाया है।

READ THIS ARTICLE ALSO : MAHARANA PRATAP JAYANTI 2021 : महाराणा प्रताप की 481 वी जयंती पर विशेष

Rani Laxmi Bai Death Anniversary : खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी, महारानी लक्ष्मी बाई की पुण्यतिथि पर विशेष
Rani Laxmi Bai Death Anniversary : खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी, महारानी लक्ष्मी बाई की पुण्यतिथि पर विशेष

बचपन से ही मणिकर्णिका के सुन्दर गुणों की चर्चा थी चहु ओर

      महारानी लक्ष्मीबाई का जन्म वाराणसी जिले के भदैनी नामक नगर में 19 नवम्बर 1835 को हुआ था। उनका जन्म के बाद नाम मणिकर्णिका था,इसी मणिकर्णिका पर कुछ वर्ष पहले कंगना रनौत ने मणिकर्णिका फ़िल्म भी बनाया गया था जिसे लोगों ने खूब पसंद किया था। रानी लक्ष्मी बाई को प्रेम से बालपन में मनु कहकर पुकारा जग्य था।

लक्ष्मी बाई की माता का नाम भागीरथीबाई तथा पिताजी  का नाम मोरोपन्त तांबे था। मोरोपन्त मराठा जाती के थे एवं मराठा बाजीराव के कुशल सेवक थे। माता भागीरथीबाई बहुत ही संस्कारवान और गुणवान महिला थी। मनु के जीवन में कठिनाइयों का ऐसा दौर आया की  बचपन में ही जब वह मात्र चार बरस की थी तभी उनकी माता का देहावसान हो गया।

इसके बाद मनु की जिम्मेदारी उनके पिता पर आ गई जिसके चलते पिता बाजी राव ने उसे अपने दरबार में ले गए और वहां उनकी अच्छी परवरिश की। इस मनु का स्वभाव ही ऐसा था कि उसने अपने पिता का आंगन अपनी गूंज से सुन्दर बगिया की तरह कर दिया था। जिसके सुन्दर गुणों की चर्चा हर तरफ होने लगी थी।

Rani Laxmi Bai Death Anniversary : खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी, महारानी लक्ष्मी बाई की पुण्यतिथि पर विशेष
गंगाधर राव

धूमधाम से हुआ था रानी लक्ष्मी बाई और गंगाधर राव का विवाह

लक्ष्मी बाई को प्रेम से लोग छबीली कहकर भी बुलाते थे। मनु का विवाह सं 1842 में गंगाधर राव निम्बालकर के साथ सम्पन्न हुआ। विवाह के पश्चात् इनका नाम लक्ष्मी बाई रखा गया।

कुछ समय बीतने के बाद लक्ष्मी बाई ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसकी दुर्भाग्य से चार माह में ही मृत्यु हो गई। 1853 में गंगाधर राव का तबियत ख़राब होने पर उन्हें दत्तक पुत्र गोद लेने की सलाह दी गई। जिसके बाद इनका नाम दामोदर राव रखा गया।

       गंगाधर की मृत्यु के पश्चात रानी लक्ष्मी बाई के जीवन में चुनौतियों का सफर शुरू हुआ इस चुनौती की शुरुवात तब हुई जब जनरल डलहौजी ने दामोदर राव को झांसी का त्तराधिकारी बनाने का विरोध किया।

रानी लक्ष्मी बाई ने इस विरोध का जवाब विद्रोह का बिगुल फुक कर अपनी शक्ति की ललकार से दिया। उन्होंने अंग्रेजों के मानने से इंकार कर दिया। रानी लक्ष्मीबाई ये कैसे सहन कर सकती थीं। उन्होने अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध का बिगुल बजा दिया और घोषणा कर दी कि मैं अपनी झांसी अंग्रेजों को नही दूंगी।

READ THIS ARTICLE ALSO : Artical : मनरेगा में जाति और मनुवादी एडवाइजरी – संजय पराते

Rani Laxmi Bai Death Anniversary : खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी, महारानी लक्ष्मी बाई की पुण्यतिथि पर विशेष
Rani Laxmi Bai Death Anniversary : खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी, महारानी लक्ष्मी बाई की पुण्यतिथि पर विशेष

रानी लक्ष्मी बाई में थे चट्टानों की तरह शौर्य के महान गुण

रानी लक्ष्मी बाई एक आम महिला की तरह नहीं थी उन्होंने अपने आप को चट्टान की तरह मजबूत कर रखा था वह बचपन से घोड़े की सवारी करना पसंद करती थी और शस्त्रकला में भी उन्होंने काफी महारत हासिल कर राखी थी।

उनके इसी गुणों ने उन्हें आम से खास बनाने में काफी मदद की थी। जिसके कारण जब 1858 में अंग्रेजी सेना ने झांसी की ओर आक्रमण करना चाहा तब झांसी की रानी ने अपनी सहायता के लिए तात्याटोपे का साथ मांगा तब उनके इस लड़ाई में तात्याटोपे ने भी बढ़चढ़कर हिस्सा लिया

और तब तात्याटोपे ने 20000 सैनकों के साथ इस युद्ध में संघर्ष करते रहे परन्तु वे अंग्रेजों के इस संघर्ष के मैदान में पराजित हो गए। अंग्रेजों की सेना इतनी अधिक क्रूर थी की वह झांसी के किले के रास्ते में आने वाले हर महिला और पुरुष को मौत के घाट उतार दिया। इस तरह झांसी में उस समय जनधन की भी काफी हानि हुई।

दो सप्ताह तक उनके बीच लड़ाई चलती रही और अंत में अंग्रेजो ने झांसी पर अधिकार कर लिया | हालांकि रानी लक्ष्मीबाई किसी तरह अपने घोड़े बादल पर बैठकर अपने पुत्र को अपनी पीठ पर बांधकर किले से बच निकली लेकिन रास्ते में उसके प्रिय घोड़े बादल की मौत हो गयी |उसने कालपी में शरण ली जहा पर वो महान योद्धा तात्या टोपे से मिली |

22 मई को अंग्रेजो ने कालपी पर भी आक्रमण कर दिया और रानी लक्ष्मीबाई के नेतृत्व में फिर तात्या टोपे की सेना हार गयी | एक बार फिर रानी लक्ष्मीबाई  और तात्या टोपे को ग्वालियर की तरफ भागना पड़ा|

उनकी जीवनी के अनुसार ऐसा दावा किया गया था की दामोदर राव उनकी सेना में ही एक था। और उसीने ग्वालियर का युद्ध लड़ा था। ग्वालियर के युद्ध में वह अपने सभी सैनिको के साथ वीरता से लड़ा था। जिसमे तात्या टोपे और रानी की संयुक्त सेनाओ ने ग्वालियर के विद्रोही सैनिको की मदद से ग्वालियर के एक किले पर कब्ज़ा कर लिया।

        ब्रिटिश इंडिया के गवर्नर जनरल डलहौजी की राज्य हड़प नीति के अनुसार अंग्रेजों ने दामोदर राव को झाँसी राज्य का उत्तराधिकारी बनाने के रास्ते में बहुत से संकट ला दिए, जिसमें उन्होंने ‘डॉक्ट्रिन ऑफ़ लैप्स’ नीति के अनुसार झाँसी राज्य को अंग्रेजी साम्राज्य में मिलाने का फैसला कर लिया।

रानी लक्ष्मीबाई ने इसका विरोध करते हुए  लंदन की अदालत में मुकदमा चलाया परन्तु यहां भी दुर्भाग्य से अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध कोई भी सकारात्मक निर्णय नहीं हो पाया और इसे रद्द कर दिया गया।

अंग्रेजों ने लक्ष्मी बाई को हर तरीके से अपमान का मुँह दिखाना चाहा इसके लिए उन्होंने झाँसी राज्य की सम्पति ज़ब्त कर ली। इतना ही नहीं उन्होंने रानी लक्ष्मीबाई के पति गंगादाहर राव के कर्ज़ को रानी के वार्षिक खर्च में से काटने का आदेश दे दिया।

अंग्रेजों ने लक्ष्मीबाई को झाँसी का किला त्यागने को कहा जिसके बाद उन्हें रानीमहल में निवास करना पड़ा।  7 मार्च 1854 को झांसी पर अंग्रेजों ने विजय प्राप्त कर अपना अधिकार कर लिया।

Rani Laxmi Bai Death Anniversary : खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी, महारानी लक्ष्मी बाई की पुण्यतिथि पर विशेष
Rani Laxmi Bai Death Anniversary : खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी, महारानी लक्ष्मी बाई की पुण्यतिथि पर विशेष

रानी लक्ष्मी बाई ने हुंकार भरी थी – “मेरी झांसी नहीं दूंगी “

       रानी लक्ष्मीबाई इतनी कमजोर महिला नहीं थी की वह अंग्रेजों की कूटनीतियों से डर कर चुप बैठ जाती उन्होंने झांसी की रक्षा करने का दृढ संकल्प लिया। 

7  मार्च,  1854  को  ब्रिटिश  सरकार  ने  एक  सरकारी  गजट  जारी  किया,  जिसके  अनुसार  झाँसी  और   ब्रिटिश  साम्राज्य  को एक करने का आदेश पारित दिया  गया  था. 

रानी  लक्ष्मीबाई  ने अंग्रेजों के इस आदेश को मानने से सख्त इंकार कर दिया और  कहा  ‘ मेरी  झाँसी  नहीं  दूंगी’और  अब  झाँसी  विद्रोहियों के संघर्ष का मुख्य केन्द्र बन गया।

रानी  लक्ष्मीबाई  ने  फिर से पुरे आत्मविश्वास के साथ  अन्य  राज्यों  की  सहायता से एक  सेना  बनाई,इस सेना का मुख्य आकर्षण का केन्द्र था कि इसमें रण के मैदान में पुरुषों के साथ महिलाओं ने भी बढ़चढ़कर हिस्सा लिया था।

इस युद्ध में संघर्ष करने के लिए इन्हे विशेष प्रशिक्षण दिया गया था। इसके अतिरिक्त इसमें अनेक महारथियों ने भी विशेष रूप से हिस्सा लिया था।  जिसमे मुख्य रूप से  गुलाम  खान,  दोस्त  खान,  खुदा  बक्श,  सुन्दर – मुन्दर,  काशी  बाई,  मोतीबाई,  दीवान  रघुनाथ  सिंह,  दीवान  जवाहर  सिंह सहित  14000 सैनिक थे।

       10  मई,  1857  को  मेरठ  में  भारतीय  विद्रोह  की शुरुवात हुई , जिसका  मुख्य कारण था  बंदूकों  की   नयी गोलियों की जगह उस पर  सूअर  और  गौमांस  की  परत  चढ़ी  थी.

जिसने हिन्दुओं  की  धार्मिक  भावनाओं  को आघात पहुंचाया था जिसके कारण रण  यह  विद्रोह  देश  भर   में  बहुत तूल पकड़ चूका था। इस  विद्रोह  का सामना करना ब्रिटिश  सरकार  के  लिए बेहद ही कठिन था ,

READ THIS ALSO : कोई नारी टोनही/ डायन नही .डॉ दिनेश मिश्र , कोनी में टोनही के सन्देह में शर्मनाक प्रताड़ना के कारण आत्मदाह की घटना

इसके डर से उन्होंने  झाँसी  को  रानी  लक्ष्मीबाई  को देने का निर्णय किया था ,  ठीक इसी समय  सितम्बर – अक्टूबर, 1857  में  रानी  लक्ष्मीबाई  को  अपने अन्य  पड़ोसी  देशो   के  राजाओ  के  साथ  युध्द  करना  पड़ा  क्योकिं  उन्होंने  झाँसी  पर  आक्रमण कर दिया था।

Rani Laxmi Bai Death Anniversary : खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी, महारानी लक्ष्मी बाई की पुण्यतिथि पर विशेष
Rani Laxmi Bai Death Anniversary : खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी, महारानी लक्ष्मी बाई की पुण्यतिथि पर विशेष

READ THIS ARTICLE ALSO

रानी लक्ष्मी बाई ने अपने किले की रक्षा के लिए करवाया था किले की विशेष रूप से किलेबंदी

रानी लक्ष्मी बाई के क़िले में ऐसी विशेष तोपें थीं। जिसके बारे में जानकर अंग्रेजों के हाथ पैर भी शिथिल पड़ गए थे, जिनमें  भवानी शंकर,एवं नालदार तोपें थीं। रानी के मजबूत तोपची थे गौस खाँ तथा ख़ुदा बक्श।

रानी ने क़िले की को बहुत ही मजबूती प्रदान की थी। धीरे धीरे अंग्रेज़ों ने क़िले को चारों तरफ से घेर लिया। करीब आठ दिनों तक अंग्रेजों और रानी लक्ष्मी बाई की सेना के बीच कठिन युद्ध चला

जिसमें अंगेजों ने किले का दक्षिणी द्वार अपनी कूटनीति का प्रयोग कर खुलवाने में तो सफल रहे। फिर उन्होंने अंदर प्रवेश कर वहां युद्ध का डंका बजा दिया और इस युद्ध में उन्होंने अपना बहुत ही वीभत्स रूप दिखाया। जिसमें उन्होंने  लूटपाट तथा हिंसात्मक गतिविधयां भी की।

Rani Laxmi Bai Death Anniversary : खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी, महारानी लक्ष्मी बाई की पुण्यतिथि पर विशेष
Rani Laxmi Bai Death Anniversary : खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी, महारानी लक्ष्मी बाई की पुण्यतिथि पर विशेष

READ THIS ARTICLE ALSO – CLECK HERE

अंतिम सांस तक लड़ती रही महारानी लक्ष्मी बाई ,अंत में वीरगति को प्राप्त हुई महान प्रतापी योद्धा

  झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई और उनकी सेना ने कसम खाई थ।  वह अपने झांसी पर किसी अंग्रेज को अधिकार करने नहीं देंगे और इसी दृढ विश्वास के बल पर जब अंग्रेजों ने किले के अंदर आक्रमण किया तब

इसी  झांसी की रानी ने मां दुर्गा के समान रूप धारण कर दाहिने हाथ में तलवार लिए, पीठ पर पुत्र  को लेकर रानी ने शत्रुओं पर प्रहार किया। ठीक इसी समय झांसी का 1857 के विद्रोह का आकर्षण का केन्द्र बन गया था।

रानी ने अपनी समस्त सेनाओं के सहयोग से अन्य राज्यों को झांसी पर अधिकार नहीं करने दिया। इस युद्ध में वह रानी एक कुशल योद्धा की तरह लड़ते- लड़ते 18 जून, 1858 को रानी लक्ष्मीबाई ने वीरगति में लीन होकर वीरांगना के रूप में एक महान स्त्री शक्ति का प्रतीक बन गई। आज ऐसी महान झांसी के रानी के बलिदान दिवस पर हम सभी को उनको शत शत नमन।

READ THIS ALSO CLICK HERE

Leave a Reply

x
%d bloggers like this: