Wednesday, September 22nd, 2021

Vyakhyan : शैली स्मृति व्याख्यान में बोलीं मरियम ढवले : आज़ादी के बाद की सबसे अधिक बेरोजगारी से जूझ रहीं हैं औरतें, ठगी और झांसे से लगातार बोझ बढ़ा रही है मोदी सरकार

शैली स्मृति व्याख्यान में बोलीं मरियम ढवले : आज़ादी के बाद की सबसे अधिक बेरोजगारी से जूझ रहीं हैं औरतें, ठगी और झांसे से लगातार बोझ बढ़ा रही है मोदी सरकार

शैलेन्द्र शैली स्मृति व्याख्यान-2021 में बोलते हुए अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की महासचिव मरियम ढवले ने उदारीकरण के दौर में आमतौर से और मोदी राज में खासतौर से महिलाओं की स्थिति भयावह रूप से खराब होने की बात कही। उन्होंने कहा कि कोरोना का बहाना लेकर जो पहलकदमी सरकार कर रही है, वह महिलाओं की परेशानी और भी बढा रही है। इनके आत्मनिर्भर भारत का अर्थ भारत की आत्मनिर्भरता नहीं है, जनता को बाजार के हाल पर छोड़ देना और सरकार का सारी जिम्मेदारी से हाथ खींच लेना है। महामारी के असर से जनता को बचाने के लिए अमरीका ने जीडीपी का 27 प्रतिशत हिस्सा लगाया और लोगों के खातों में पैसे डाला, ब्रिटेन ने 17 प्रतिशत डाला और हमारी सरकार ने 2 प्रतिशत से भी कम लगाया। ऊपर से किसी भी क्षेत्र में बजट नहीं बढाया — स्वास्थ्य में, शिक्षा में किसी में भी नहीं। उलटे मनरेगा में कटौती कर ली गयी।

उन्होंने कहा कि महामारी के पहले भी औरतों को काम नहीं मिल रहा था। महामारी में और स्थिति बिगड़ गयीं। घरेलू कामगार, मनरेगा कामगार, असंगठित क्षेत्र के मजदूर सबसे अधिक मुश्किल में हैं और सडकों पर आ रहे हैं। काम न होने से उसकी जिंदगी बेहद असुरक्षित हो गयी है। सरकार कह रही है कि मुफ्त अनाज दे रहे हैं, कितना? 5 किलो! और वह भी केवल नबंबर तक!! लेकिन सूखे अनाज से तो कुछ नहीं होता। उसके साथ जो जिंस देने होते हैं, वह नहीं दिये जा रहे हैं। पेट्रोल-डीजल के दाम आसमान छू रहे हैं। अपनी जिंदगी चलाने के लिये सम्मान की जिंदगी जीने के लिये जरूरत की चीजें नहीं मिल रही हैं। इन्सानी जिंदगी के सम्मान के लिये आवश्यक चीजें गायब होती जा रही हैं। बस्तियों में, गांवों में अनाज की भारी कमी है। नतीजा यह निकला कि आज भारत दुनिया का सबसे भूखा देश बन गया है। वैश्विक भूख सूचकांक (ग्लोबल हंगर इंडेक्स) के अनुसार 107 देशों में भारत का 94 वां स्थान है।

गैस सिलेंडर उज्ज्वला योजना की ठगी उजागर करते हुए मरियम ढवले ने कहा कि इसके जरिये आधार कार्ड वगेैरह जोड़कर कई लोगों को गैस सब्सिडी से बाहर कर दिया गया। नतीजे में 22,635 करोड रूपये की सब्सिडी आज 3559 हजार करोड रुपयों पर आ गयी है। इसका मतलब कुकिंग गैस की सब्सिडी खत्म करके औरतों की जेब से पैसे निकाला जा रहा है। अब सिलेंडर 1000 रूपये के आसपास आ रहा है। उज्ज्वला का कोई नाम नहीं लेता है। ‘सबका साथ, सबका विकास’ कह-कह कर पेटोल पर टैक्स लगा कर ढाई लाख करोड रूपये कमा रही है। जब जनता बेरोजगार है, उसकी जेब से पैसा निकाला जा रहा है, चोरी किया जा रहा है — तब पूंजीपतियों का टेक्स 1.45 लाख करोड रूपये माफ कर दिया गया। मतलब सीधा है कि जनता की जेब से निकाल कर पूंजीपति की जेब भरी जा रही है।

“महिलायें शोषण के पहले निशाने पर हैं, तो प्रतिरोध के भी अग्रिम मोर्चे पर हैं” विषय पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि आज 2.5 करोड नये बेरोजगार देश में घूम रहे हैं। ऊपर से मनरेगा बजट में कटौती कर दी गई है। वर्ष 2020-21 और 21-22 के बजट में उन्होने प्रस्ताव किया है कि जहां पर अधिकतर औरतों को सुरक्षित रोजगार मिलता है, उन पब्लिक सेक्टर के रोजगारों में जैसे बैंक, एल आई सी, स्टील, इलेक्ट्रिसिटी, सीमेंट, रेलवे का निजीकरण करके पैसा खडा करेंगे। पूंजीपतियों का कर्ज माफ करेंगे। उन्होंने पूछा कि जनता पैसे से खडी की हुयी संपत्ति को बेचने का अधिकार मोदी और शाह को किसने दिया? शिक्षा, बैंक आदि क्षेत्रों में रोजगार महिलाओं के लिये सुरक्षित थे, वहां पर भी यदि रोजगार खत्म हो गया तो क्या होगा? नये कानूनों में बच्चा होने के बाद मिलने वाली छुट्टी में कटौती की गयी है। यदि महिला छुट्टी लेती है, तो उसे नौकरी से निकालने का प्रावधान कर दिया गया है। इसका मतलब है कि औरतों की बेरोजगारी बढेगी।

उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे रोजगार में कटौती होगी, वैसे-वैसे महिलाओं की असुरक्षा, मजबूरी, गरीबी, लाचारी, बेहाली बढेगी; क्योंकि आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने और एक सम्मानजनक जिंदगी के लिये रोजगार जरूरी है। इसलिये रोजगार का संघर्ष, औरतों की बराबरी का संघर्ष एक महत्वपूर्ण संघर्ष हैं। आज बड़ी संख्या में औरतें घर से निकल रहीं हैं। मोदी को शर्म आनी चाहिये कि जब जनता की बदहाली बढ रही है, तब अंबानी और अडानी की संपत्ति में हजारों करोड़ रूपये का इजाफा महामारी के दौरान हुआ है। निजीकरण का एक दूसरा अर्थ भी है। निजीकरण का अर्थ केवल किसी उफ्योग को निजी हाथों में देना नहीं है, बल्कि उसका महंगा होना भी है।

शिक्षा के निजीकरण से और महंगी हुयी शिक्षा का अर्थ लड़कियों में अशिक्षा का बढना है। आजादी के पहले जोतिबा फुले और सावित्री बाई फुले ने जो आंदोलन चलाया था, उसे ही आगे बढाना होगा। लाॅकडाउन में आॅनलाइन शिक्षा के दौर में गरीब के बच्चे, लडकियां शिक्षा से बाहर हो गई हैं। एक आदिवासी गांव का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र के आचाड गांव में जब हम गये, तो वहां की सरपंच हमसे मिलने आईं। उन्होने कहा कि कैसे भी करके स्कूल चालू करवाइये, क्योंकि यहां का एक भी बच्चा पिछले दो सालों में कुछ पढ़ नहीं पाया है, क्योंकि गांव तक इंटरनेट है ही नहीं। ऐसे तो कई गांव और कस्बे होंगे। कई शहरों की कई गरीब बस्तियां होंगी।

उन्होंने बदले जा रहे पाठ्यक्रमों के विनाशकारी असर पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि बच्चों की सोच को, नींव कमजोर करने के लिये मनुस्मृति जैसे पुस्तकों का आधार लिया जा रहा है। पाठ्य पुस्तकों में यह डाला जा रहा है कि दहेज देना हमारी संस्कृति का हिस्सा है और जो परिवार दहेज नहीं देता, वह देशद्रोही होता है। यह क्या पढाने वाले हैं हमारे बच्चों को। और यदि बच्चों के नाजुक दिमागों में ऐसी विषैली विचारधारा को रोपा जायेगा, तो वह बड़ा होने पर अपनी पत्नी और अन्य महिलाओं के साथ कैसा व्यवहार करेगा, यह सोचा जा सकता है। अंधविश्वास को पाठ्य पुस्तकों में घुसाया जा रहा है। उसमें सांप्रदायिक मान्यतायें घुसाई जा रही हैं। आज़ादी के 74वें साल में यह शर्म की बात है कि जो उस वक्त हमारे संविधान का, हमारे प्रगतिशील सिद्धांतों का विरोध कर रहे थे, वे आज सत्ता में है।

उन्होंने बताया कि लक्षद्वीप के अंदर कैसा जुलम ढाया जा रहा है। अपने पूंजीपति दोस्तों को यह सरकार उस द्वीप की पूरी संपत्ति को दे देना चाहते हैं। उसका विरोध करने वाले हर किसी को दबाया जा रहा है। लेकिन वे लड़ रहे हैं। वहां पर एक फिल्मकार आयशा सुल्ताना ने इसके खिलाफ आवाज उठायी, तो उसके खिलाफ देशद्रोह की धारा लगा दी गई। सीएए और एनआरसी के खिलाफ औरतों ने आवाज उठायी हैं। किसान आंदोलन में भी महिलायें सक्रिय हैं, क्योंकि वे जानती हैं कि जमीन जाने का मतलब औरतों की बदहाली है। हर आंदोलन में, हर मोड़ पर वे सक्रिय हैं। किसान आंदोलन में, महापंचायत में वे भाग ले रही हैं, उसका नेतृत्व कर रही हैें। खेती में 70 प्रतिशत काम औरते करती हैं। वनोपज जमा करना, पशुपालन करना ये सारे काम खेती से जुडे हुए हैं। जमीन के साथ उसकी जिंदगी, उसका घर जुड़ा हुआ है। किसान आंदोलनन में भी वे बडी संख्या में भाग ले रही हैं।

उन्होंने कहा कि यह हिंसा मनुवादी सोच की वजह से बढ़ रही है, जो कहता है कि औरतें सिर्फ उपभोग की वस्तु हैं। अभी दिल्ली के अंदर एक दलित बच्ची पर बलात्कार हुआ। बलात्कारी बेधड़क घूम रहे है, क्योंकि उन्हें उन लोगों से संरक्षण मिला हुआ है, जो ये बाते कर रहे हैं कि औरतों का स्थान घर में है और औरतों को बराबरी का अधिकार नहीं मिलना चाहिये। आज औरतें दोयम स्थान पर हैं। औरतों की गिनती इंसान के रूप में नहीं की जाती।

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